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सेवासदन
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अब प्रस्तावके तीसरे भागकी बारी आई । कुंवर अनिरुद्धसिंहनेउसका समर्थन किया । हकीम शोहरतखा,सैयद शफकत अली, शरीफहसन और शाकिरबेंगने भी उसका अनुमोदन किया । लेकिन प्रभाकर-राव और उनके मित्रोने उसका भी विरोध किया। तरमीमके पास हो जानेके बाद उन्हें इस संबंध में अन्य सभी उद्योग निष्फल मालूम होतेथे । वह उन लोगोंमें थे जो या तो सब लेगे या कुछ न लेगे । प्रस्तावअस्वीकृत हो गया ।

कुछ रात गये सभा समाप्त हुई। जिन्हें हारकी शंका थी वह हंसते हुए निकले,जिन्हें जीतका निश्चय था, उनके चेहरोपर उदासी छाई हुई थी।

चलते समय कुंबरसाहवने मिस्टर रुस्तमभाई से कहा, यह आप- लोगोंने क्या कर दिया ?

रुस्तमभाईने व्यंग भावसे उत्तर दिया, जो अपने किया वही हमने किया । आपने घड़ेमें छेद कर दिया, हमने उसे पटक दिया । परिणाम दोनोका एक ही है ।

सब लोग चले गये । अन्वेरा गहरा हो गया। चौकीदार और माली भी फाटक बन्द करके चल दिये, लेकिन पद्मसिंह वहीं घासपर निरुत्साह और चिंताकी मूर्ति बने हुए बैठे थे।

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पद्मसिंहकी आत्मा किसी भॉति इस तरमीमके स्वीकार करनेमें अपनी भूल स्वीकार न करती थी। उन्हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्रगण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेगे। उन्हें प्रस्ताव-के एक अंशके अस्वीकृत हो जानेका खेद न था, खेद यह था कि इसका दोष उनके सिर मढ़ा जाता था, हालांकि उन्हें यह संपूर्णत अपनेसहकारियोंकोअसहिष्णुता और अदूरदर्शिता प्रतीत होती थी । इस तरमोमको वह गौण ही समझते थे । इसके दुरुपयोगकी जो शंकाएं