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३१२ सेवासदन

शर्मा--वहाँ लच्छेदार बातों और तीव्र समालोचनाओेके सिवा और क्या रखा है ?

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सदनसिंहका विवाह सस्कार हो गया ? झोपड़ा खूब सजाया गया था। बही मंडपका काम दे रहा था, लेकिन कोई भीडभाड न थी।

पद्मसिंह उसी दिन घर चले गये और मदनसिंहसे सब समाचार कहा । वह यह सुनते ही आग हो गये, बोले, मैं उस छोकरेका सिर काट लूँगा, वह अपनेको समझता क्या है ? भामाने कहा, मैं आज ही जाती हूँ उसे समझाकर अपने साथ लिवा लाऊँगी। अभी नादान लडका है । उस कुटनी सुमनकी बातोमे आ गया है । मेरा कहना वह कभी न टालेगा।

लेकिन मदनसिंहने भामाको डाँटा और धमकाकर कहा, अगर तुमने उधर जानेका नाम लिया तो मैं अपना और तुम्हारा गला एक साथ ही घोंट दूंँगा। वह अगमे कूदता है कूदने दो। ऐसा द्घघपीता नादान बच्चा नहीं है । यह सब उसकी जिद्द है । बच्चूको भीख मगाकर न छोड़े’तो कहना। सोचते होगेदादा सर जायेंगे तो आनन्द करेगा । मुंँह घो रखें,यह कोई जायदाद नही है । यह मेरी अपनी कमाई है । सब-की-सब कृष्णार्पण कर दूगा । एक फूटी कौड़ी तो मिलेगी ही नही।

गाँवमे चारो ओर बतकहाव होने लगा । लाला बैजनाथको निश्चय हो गया कि ससारसे धर्म उठ गया । जब लोग ऐसे-ऐसे नीच कर्म करने लगे तो धर्म कहांँ रहा ? न हुई नवाबी, नही तो आज बचूकी धज्जियाँ उड जाती । अब देखें कौन मुँह लेकर गाँवमे आते है ।

पद्मसिंह रातको बहुत देरतक भाईके साथ बैठे रहे, लेकिन ज्योंही वह सदनका कुछ जिक्र छेडते,मदनसिंह उनकी ओर ऐसी आग्नेय दृष्टिय देखते कि उन्हें बोलनेकी हिम्मत न पडती । अन्तमे जब वह सोने चले तो पद्मसिंहने हताश होकर कहा,भैया,सदन आपसे अलग रहे तब भी आपका लडका ही कहलावेगा । वह जो कुछ नेक बद करेगा उसकी बदनमी हम सब पर आवेगी । जो लोग इस अवस्थाको भलीभाँति जानते है, वह चाहे