पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२७७

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३२८ सेवासदन


की इच्छा न होती थी। अकस्मात् कुत्तों के भूँकने से किसी नये आदमी के गाँव आनेकी सूचना दी। मदनसिंह की छाती धड़कने लगी। कही सदन तो नहीं आ रहा है। किताब बन्द करके उठे तो पद्मसिंह को आते देखा। पद्मसिंहने उनके चरण छूए फिर दोनो माइयोंमें बातचीत होने लगी ।

मदन-—सब कुशल हैं?

पद्म-—जी हाँ, ईश्वर की दया है।

मदन-भला उस बेईमानकी भी कुछ खोज-खबर मिली है?

पद्म-—जी हाँ, अच्छी तरह है। दसवें-पाँचवें मेरे यहाँ आया करता है। में कभी-कभी हाल-चाल पुछवा लेता हूँ। कोई चिन्ताकी बात नहीं है।

मदन-—भला वह पापी कभी हमलोगों की भी चर्चा करता है या बिल्कुल मरा समझ लिया? क्या यहाँ आने की कसम खा ली है। क्या हमलोग मर जायंगे तभी आवेगा? अगर उसकी यही इच्छा है तो हम लोग कहीं चले जायें। अपना घर द्वार ले अपना घर संभाले। सुनता हूँ, वहां मकान बनवा रहा है। वह तो वहाँ रहेगा और यहाँ कौन रहेगा। यह मकान जिसके लिये छोडे देता है।

पद्म-—जी नहीं, मकान वकान कहीं नहीं बनवाता, यह आपसे किसीने झूठ कह दिया। हाँ, चूने की कल खड़ी कर ली है और यह भी मालूम हुआ है कि नदी पार थोडीसी जमीन भी लेना चाहता है।

मदन--तो उमसे कह देना, पहले आकर इस घरमें आग लगा जाय तब वहाँ जगह जमीन ले ।

पद्म--यह आप क्या कहते हैं, वह केवल आपलोगों की अप्रसन्नता के भय से नहीं आता । आज उसे मालूम हो जाय कि आपने उसे क्षमा कर दिया तो सिरके बल दौड़ा आवे। मेरे पास आता है तो घण्टों आप हीकी बातें करता रहता है। आपकी इच्छा हो तो कल ही चला आवे।

मदन--नही, मैं उसे बुलाता नहीं। हम उसके कोन होते है जो यहाँ आयेगा। लेकिन यहाँ आवे तो कह देना जरा पीठ मजबूत कर रखें। उसे देखते ही मेरे सिरपर शैतान सवार हो जायगा और मैं ठण्डा