पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२८४

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सेवासदन ३३७

हृदय सागरमें भक्तिकी तरंगे उठ रही है। इसी प्रेम और भक्तिकी निर्मल ज्योति से हदयको अँधेरी कोठरियाँ प्रकाशपूर्ण हो गई है। मिथ्याभिमान और लोकलज्जा या भयरूपी कीट पतंग वहाँसे निकल गये है। अब वहाँ न्याय,प्रेम और सव्यवहार का निवास है।

आनन्दके मारे सदनके पैर जमीनपर नहीं पड़ते। वह अब मल्लाहों को कोई-न-कोई काम करने का हुक्म देकर दिखा रहा है कि मेरा यहाँ कितना रोब है। कोई चारपाई निकालने जाता है, कोई बाजार दौड़ा जाता है। मदनसिह फूले नहीं समाते और अपने भाईके कानोंमे कहते हैं, सदन तो बडा चतुर निकला। मैं तो समझता था, किसी तरह पड़ा दिन काट रहा होगा, पर यहाँ तो बड़ा ठाठ है।

इधर भामा और सुभद्रा भीतर गईं। भामा चारो ओर चकित होकर देखती थी। कैसी सफाई है! सब चीजे ठिकाने से रखी हुई है । इसकी बहन गुणवान मालूम होती है।

वह सौरीगृह में गई तो शान्ताने अपनी दोनो सासोके चरण स्पर्श किये। भामाने बालक को गोद में ले लिया । उसे ऐसा मालूम हुआ मानों वह कृष्णका ही अवतार है। उसकी आंखों से आनन्द के आंसू बहने लगे।

थोडी देर में उसने मदनसिंहसे आकर कहा,और जो कुछ हो पर तुमने बहू बड़ी रूपवती पाई है । गुलाब का फूल है और बालक तो साक्षात भगवानका अवतार ही है ।

मदन--ऐसी तेजस्वी न होता तो मदनसिंहको खीच कैसे लाता ?

भामा--बहू वडी सुशील मालूम होती है।

सदन-—तभी तो उसके पीछे माँ बापको त्याग दिया था।

सब लोग अपनी अपनी धुनमे मगन थे, पर किसीको सुधि न थी कि अभागिनी सुमन कहाँ है।

सुमन गंगा तटपर सन्ध्या करने गई थी। जब वह लौटी तो उसे झोपडे के द्बारपर गाड़ियाँ खड़ी दिखाई दी। दरवाजे पर कई आदमी बैठे थे। पद्मसिंह को पहचाना समझ गई कि सदन के माता-पिता आ