पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२८५

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३३८ सेवासदन

गये। वह आगे न बढ सकी। उसके पैरोमें बेड़ी-सी पड गई। उसे मालूम हो गया कि अब यहाँ मेरे लिये स्थान नही, है, अब यहाँसे मेरा नाता टूटता है। वह मूर्तिवत खड़ी सोचनेलगी कि कहाँ जाऊँँ?

इधर एक माससे शान्ता और सुमनमें बहुत मनमुटाव हो गया था। वही शान्ता तो विधवा आश्रममे दया और शान्तिकी मूर्ति बनी हुई थी, अब सुमनको जलाने और रुलानेपर तत्पर रहती थी। उम्मेदवारीके दिनोमें हम जितने विनयशील और कर्तव्यपरायण होते है, उतने ही अगरजगह पानेपर बने रहे तो हम देवतुल्य हो जायँ। उस समय शान्ता को सहानुभूति की जरूरत थी, प्रेम की आकांक्षा ने उसके चित्त को उदार, कोमल, नम्र बना दिया था, पर अब अपना प्रेमरत्न पाकर किसी दरिद्र से घनी हो जाने वाले मनुष्य की भांति उसका हृदय कठोर हो गया था। उसे यह भय खाये जाता था कि सदन कही सुमन के जालमें न फँस जाय। सुमनके पूजापाठ, श्रद्धा-भक्ति का उसकी दृष्टि में कुछ भी मूल्य न था। वह इसे पाखण्ड समझती थी। सुमन सिरमें तेल मलने या साफ कपड़ा पहनने के लिये तरस जाती थी, शान्ता इसे समझती थी। वह सुमनके आचार व्यवहारकी बड़ी तीव्र दृष्टिसे देखती रहती थी। सदनसे जो कुछ कहना होता सुमन शान्तासे कहती, यहाँ तक कि शान्ता भोजनके समय भी रसोईमे किसी न किसी बहाने आ बैठती थी। वह अपने प्रसवकाल से पहले सुमन को किसी भाँति वहाँ से टालना चाहती थी,सौरीगृह हमे बन्द होकर बह सुमनकी देख-भाल न कर सकेगी। उसे और सब कष्ट सहना मजूर था, पर यह दाह न सही जाती थी।

लेकिन सुमन सब कुछ देखते हुए भी न देखती थी, सब कुछ सुनते हुए भी कुछ न सुनती थी। नदीमे डूबते हुए मनुष्य के समान वह इस तिनकेके सहारेको भी छोड़ न सकती थी। वह अपना जीवन मार्ग स्थिर न कर सकती थी, पर इस समय सदनके माता पिताको यहाँ देखकर उसे यह सहारा छोड़ना पड़ा, इच्छा शक्ति जो कुछ न कर सकती थी वह अवस्थामें कर दिखाया।