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सेवासदन
 

गजाधर--बिलकुल झूठ है, वारह का घंटा अपने कानो से सुनकर सोया हूँ

सुमन--सुना होगा, नींद मे सिर पैर की खबर ही नहीं रहती, घण्टे गिनने बैठे थे ।

गजाधर-अब यह धाँवलो एक न चलेगो । साफ-साफ बताओ, तुम अब तक कहां रही । में तुम्हारा रंग ढंग आजकल देख रहा हूँ । अन्वा नही हूं । मैं ने भो त्रियाचरित पढा है । ठीक-ठीक बता दो, नही तो आज जो कुछ होना है हो जायगा।

सुमन -एक बार तो कह दिया कि में दस-ग्यारह बजे यहाँ आ गई । अगर तुम्हें विश्वास नही आता, न आवे । जो गहने गढ़ाते हो मत गढाना । रानी रूठगी अपना सुहाग लेगी । जब देखो म्यान से तलवार बाहर ही रहती है, न जाने किस विरते पर !

यह कहते-कहते सुमन चौक गई । उसे ज्ञात हुआ कि में सीमा से बाहर हुई जाती हूं । अभी द्वार पर बैठे हुए उसने जो जो बात सोची थी और मन में जो बात स्थिर की थी, वह सब उसे विस्मृत हो गई । लोकाचार और हृदय में जमे हुए विचार हमारे जीवन में आकस्मिक परिवर्तन नही होने देते।

गजाधर सुमन की यह कठोर वाते सुनकर सन्नाटे मे आ गया । यह पहला ही अवसर था कि सुमन यो उसके मुँह आई थी । क्रोधोन्मत्त होकर बोला, क्या तू चाहती है कि जो कुछ तेरा जी चाहे किया करे और मै कुछ न करुँ ? तु सारी रात न जाने कहाँ रही, अब जो पूछता हूँ तो कहती है मुझे तुम्हारी परवा नही है, तुम मुझे क्या कर देते हों ? मुझे मालूम हो गया कि शहर का पानी तुझे भी लगा, तूने भी अपनी सहेलियों का रंग पकडा । वस अब मेरे साथ तेरा निबाह न होगा । कितना समझाता रहा कि इन चुडैलो के साथ न बैठे, मेले-ठेले मत जा, लेकिन तूने न सुना न सुना । मुझे तु जब तक बता न देगी कि तू सारी रात कहाँ रही, तब तक मै तुझे घर मे पैठने न दूँगा । न बतावेगी तो समझ ले कि आज से तू मेरी कोई नही, तेरा जी जहाँ चाहे जा, जो मन में आवे कर ।