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सेवासदन
४७
 

सुमन ने कातर भाव से कहा, वकील साहब के घर को छोड़कर में और कही नही गई, तुम्हें विश्वास न हो तो आप जाकर पूछ लो । वही चाहे जितनी देर लगी हो । गाना हो रहा था, सुभद्रा देवी ने आने नही दिया ।

गजाधर ने लांछनायुक्त शब्दो मे कहा,अच्छा,तो अब वकील साहब से मन मिला है, यह कहो, फिर भला मजूर की परवाह क्यो होने लगी ?

इस लांछना ने सुमन के हृदय पर कुठाराघात का काम किया । झूठा इलजाम कभी नही सहा जाता । वह सरोष होकर बोली, कैसी बातें मुह से निकालते हो, हक-नाहक एक भले मानस को बदनाम करते हो । मुझे आज देर हो गई है मुझे जो चाहो कहो, मारो,पीटो, वकील साहब को क्यो बीचमें घसीटते हो ? वह बेचारे तो, जबतक मै घर में रहती हूँ अन्दर कदम नही रखते ।

गजाघर बोला, चल छोकरी, मुझे न चरा, ऐसे-ऐसे कितने भले आदमियों को देख चुका हूँ । वह देवता है, उन्ही के पास जा । यह झोपड़ी तेरे रहने योग्य नही है । तेरे हौसले बढ़ रहे है । अब तेरा गुजर यहाँ न होगा।

सुमन देखती थी कि बात बढती जाती है । यदि उसकी बात किसी तरह लोौट सकतीं तो उन्हें लौटा लेती, किन्तु निकला हुआ तीर कहाँ लौटता है ? सुमन रोने लगी और बोली, मेरी आंखें फूट जाएँ, अगर मैंने उनकी तरफ ताका भी हो। मेरी जीभ गिर जाय अगर मै ने उनसे एक बात की हो । जरा मन बहलाने सुभद्रा के पास चली जाती हूंँ, अब मना करते हो, न जाऊँगी ।

मन में जब एक बार भ्रम का प्रवेश हो जाता है तो उसका निकलना कठिन हो जाता है । गजाधरने समझा कि सुमन इस समय केवल मेरा क्रोध शान्त करने के लिए यह नम्रता दिखा रही है । कटुतापूर्ण स्वर से बोला, नही, जाओगी क्यों नहीं । वहाँ ऊँची. अटारी सैर को मिलेगी, पकवान खानेको मिलेंगे, फूलों की सेज पर सोओगी, नित्य राग-रंग की घूम रहेगी ।

व्यंग और क्रोध में आग और तेल का संबंध है। व्यंग हृदय को इस प्रकार विदीर्ण कर देता है जैसे छेनी बर्फ के टुकड़े को । सुमन क्रोध से विह्वल