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सेवासदन
 

दूसरे दिन प्रातकाल जीतन किसी काम से बाजार गया । चारों तरफ यही चर्चा सुनी । दूकानदार पूछते थे, क्यों जीतन नयी मालकिन के क्या रंग-ढंग है ? जीतन यह आलोचनापूर्ण बाते सुनकर घबराया हुआ घर आया और बोला, भैया , बहूजी ने जो गजाधर की दुलहिन को घर ठहरा लिया है, इस पर बाजार मे बडी़ बदनामी हो रही है । ऐसा मालूम होता है कि यह गजाधर से लड़कर आई है ।

वकील साहब ने यह हाल सुना तो सन्नाटे में आ गये । कचहरी जाने के लिए अचकन पहन रहे थे, एक हाथ आस्तीन मे था, दूसरा बाहर । कपड़े पहनने की भी सुधि न रही । उन्हे जिस बात का भय था वह हो ही गई । अब उन्हे गजधर की लापरवाही का मर्म ज्ञात हुआ । मूर्तिवत् खडे़ सोचते रहे कि क्या करू ? इसके सिवा और कौन-सा उपाय है कि घर से निकाल दू । उस पर जो बीतनो हो बीते, मेरा क्या वश है ? किसी तरह बदनामी से तो बचुँ । सुभद्रा पर जीमे झुझलाये । इसे क्या पडी थी कि उसे अपने घर मे ठहराया । मुझ से पूछताछ नही । उसे तो घरमें रहना है, दूसरों के सामने आँखे तो मेरी नोचो -होगी । मगर यहाँ से निकाल दूगा तो बेचारी जायगी कहाँ ? यहाँ तो उसका कोई ठिकाना नही मालूम होता । गजाधर अब उसे शायद अपने घर में रखेगा, आज दूसर दिन है, उसने खबर तक नही ली । इससे तो यह विदित होता है कि उसने उसे छोड़ने का निश्चय कर लिया । दिल में मुझे दयाहीन और क्रूर समझेगी । लेकिन बदनामी से बचने का यही एकमात्र उपाय है । इसके सिवा और कुछ नही हो सकता । यह विवेचना करके वह जोतन से बोले, तुमने अबतक मुझ से क्यों न कहा ?

जोतन--सरकार मुझे आज ही तो मालूम हुआ है, नही तो जान लो भया, मै बिना कहे नही रहता ।

शर्म्मा जी—अच्छा तो घर मे जाओ ओर सुमन से कहो कि तुम्हारे यहाँ रहन से उनकी बदनामी हो रही है । जिस तरह बन पडे आज ही