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सेवासदन
५१
 


दो, वही पड़ी रहूँगी । अपने से जो कुछ हो सकेगा तुम्हारी सेवा-टहल कर दिया करुँगी ।

जब पडितजी भीतर आये तो सुभद्रा ने सारी कथा उनसे कही । पंडितजी बडी चिन्ता में पड़े । एक अपरिचित स्त्री को उसके पति से पूछे बिना अपने घर मे रखना अनुचित मालूम हुआ । निश्चय किया कि चलकर गजाधर को बुलवाऊँ और समझाकर उसका क्रोध शान्त कर दूँ । इस स्त्री का यहाँ से चला जाना ही अच्छा है।

उन्होंने बाहर आकर तुरन्त गजाधर के बुलाने को आदमी भेजा, लेकिन वह घर पर न मिला । कचहरी से आकर पण्डितजी ने फिर गजाधर को बुलवाया, लेकिन फिर वही हाल हुआ।

उधर गजाधर को ज्योही मालूम हुआ कि सुमन पद्मसिंह के घर गई है, उसका सन्देह पूरा हो गया । वह घूम-घूमकर शर्माजी को बदनाम करने लगा । पहले विट्दाठलदास के पास गया । उन्होने उसकी कथा को वेद-वाक्य समझा । यह देश का सेवक और सामाजिक अत्याचारों का शत्रु-उदारता और अनुदारता का विलक्षण सयोग था, उसके विश्वासी हृदय में सारे जगत् के प्रति सहानुभूति थी, किन्तु अपने वादी के प्रति लेशमात्र भी सहानुभूति न थी । वैमनस्यमें अन्ध-विश्वास की चेष्टा होती है । जबसे पद्मसिहलने मुजरे का प्रस्ताव किया था विट्ठलदास को उनसे द्वेष हो गया था । वे यह समाचार सुनते ही फूले न समाये । शर्माजी के मित्र और सहयोगियो के । पास जा-जाकर इसकी सूचना दे आये । लोगो से कहते, देखा आपने ! मैं कहता न था कि यह जलसा अवश्य रग लायेगा । एक ब्राह्मणी को उसके घर से निकालकर अपने घर मे रख लिया । बेचारा पति चारों ओर रोता फिरता है । यह है उच्च शिक्षा का आदर्श ! में तो ब्राह्मणी को उसके यहाँ देखते ही भाँप गया था कि दाल में कुछ काला है । लेकिन यह न समझता था कि अन्दर ही अन्दर यह खिचड़ी पक रही है ।

आश्चर्य तो यह था कि जो लोग शर्माजी स्वभाव से भली भाति परिचित थे उन्होंने भी इस पर विश्वास कर लिया।