पृष्ठ:सेवासदन.djvu/५४

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सेवासदन
५७
 


तो तलाक दे देती है । लेकिन हम सब वही पुरानी लकीर पीटे चली जा रही है ।

सुमन ने सोचकर कहा, क्या करूँ बहन, लोकलाज का डर है, नही तो आराम से रहना किसे बुरा मालूम होता है ?

भोली--यह सब उसी जिहालत का नतीजा है । मेरे माँ-बाप ने भी मुझे एक बडे मियाँँ के गले बॉध दिया था । उसके यहाँँ दौलत थी और सब तरह का आराम था, लेकिन उसकी सूरत से मुझे नफरत थी । मैंने किसी तरह छः महोने तो काटे, आखिर निकल खडी़ हुई । जिन्दगी जैसी निआमत रो-रोकर दिन काटने के लिए नही दी गई है । जिन्दगी का कुछ मजा ही न मिला तो उससे फायदा ही क्या ? पहले मुझे भी डर लगता था कि बडी बदनामी होगी, लोग मुझे जलील समझगे, लेकिन घर से निकलने की देर थी, फिर तो मेरा वह रंग जमा कि अच्छे-अच्छे खुशामद करने लगे । गाना मैने घर पर ही सीखा था, कुछ और सीख लिया, बस सारे शहर में धूम मच गई । आज यहाँ कौन रईस, कौन महाजन, कौन मौलवी, कौन पंडित ऐसा है जो मेरे तलुवे सहलाने में अपनी इज्जत न समझे ? मन्दिर में, ठाकुर द्वारे में मेरे मुजरे होते है । लोग मिन्नते करके ले जाते है । इसे मैं अपनी बेइज्जती कैसे समझू ? अभी एक आदमी भेज दू तो तुम्हारे कृष्णमन्दिर के महन्तजी दौड़े चले आवें । अगर कोई इसे बेइज्जती समझे तो समझा करे ।

सुमन--भला यह गाना कितने दिन में आ जायगा ?

भोली--तुम्हे छ: महीन मे आ जायगा ! यहाँ गाने को कौन पूछता है, ध्रुपद और तिल्लाने की जरूरत ही नहीं । बस चलती हुई गजलों की धूम है, दो-चार ठुमरियाँ और कुछ थियेटर के गाने आ जायें और बस फिर तुम्ही तुम हो । यहाँ तो अच्छी सूरत और मजेदार बाते चाहिये, सो खुदा ने यह दोनों बात तुममे कूट-कूटकर भर दी है । मैं कसम खाकर कहती हूँ सुमन, तुम एक बार इस लोहे की जंजीर को तोड़ दो, फिर देखो लोग कैसे दीवानो की तरह दौड़ते है ।