पृष्ठ:सेवासदन.djvu/६२

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सेवासदन
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गया। सदनने जोरसे डाँटा, धत्। कुत्ता दुम दबाकर भागा। सदन कई पग उसके पीछे दौड़ा। भयकी चरम सीमा ही साहस है। सदनको विश्वास हो गया, कुत्ता था, भूत होता तो अवश्य कोई न कोई लीला करता। भय कम हुआ, किन्तु वह वहां से भागा नही। वह अपने भीरु हृदयको लज्जित करनेके लिए कई मिनटतक पीपलके नीचे खड़ा रहा। इतना ही नहीं उसने पीपलकी परिक्रमा की और उसे दोनों हाथोसे बलपूर्वक हिलानेकी चेष्टा की। यह विचित्र साहस था। ऊपर पत्थर, नीचे पानी, एक जरा-सी आवाज, एक जरा-सी पत्तीकी खड़कन उसके जीवनका निपटारा कर सकती थी। इस परीक्षासे निकलकर सदन अभिमानसे सिर उठाए आगे बढ़ा।

१३

सुमनके चले जानेके बाद पद्मसिंहके हृदयमें एक आत्मग्लानि उत्पन्न हुई। मैंने अच्छा नही किया। न मालूम वह कहाँ गई। अपने घर चली गई हो तो पूछना ही क्या, किन्तु वहाँ वह कदापि न गई होगी। मरता क्या न करता, कही कुली डिपोवालोके जालमे फंस गई तो फिर छूटना मुश्किल है। यह दुष्ट ऐसे ही अवसरपर अपना बाण चलाते है, कौन जाने कही उनसे भी घोरतर दुष्टाचारियोंके हाथमें न पड़ जाय। साहसी पुरुषको कोई सहारा नही होता तो वह चोरी करता है, कायर पुरुषको कोई सहारा नही होता तो वह भीख माँगता है, लेकिन स्त्रीको कोई सहारा नही होता तो वह लज्जाहीन हो जाती है। युवतीका घरसे निकलना मुहसे बातका निकलना है। मुझसे वही भूल हुई, अब इस मर्यादापालनसे काम न चलेगा। वह डूब रही होगी, उसे बचाना चाहिए।

वह गजाधरके घर जानेके लिए कपड़े पहनने लगे। तैयार होकर घरसे निकले।किन्तु यह सशय लगा हुआ था कि कोई मुझे उसके दरवाजेपर देख न ले। मालूम नहीं, गजाधर अपने मन मे क्या समझे। कही उलझ पड़ा तो मुश्किल होगी। घरसे बाहर निकल चुके थे, लौट पड़े और कपड़े उतार दिये।