पृष्ठ:सेवासदन.djvu/६१

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सेवासदन
 


पञ्वायत बैठी हुई थी । सदन की अब यही एक शंका और थी । वह पहले से हृदय के स्थिर किये हुए था, लेकिन ज्यो-ज्यों वह स्थान समीप आता जाता था, उसका हिसाब बर्फ के समान पिघलता जाता था । जब एक फलग्डि शेष रह गया तो उसके पग न उठे । वह जमीनपर बैठ गया और सोचने लगा कि क्या करू । चारों ओर देखा कही कोई मनुष्य न दिखाई दिया । यदि कोई पशु ही नजर आाता तो उसे धैर्य हो जाता । अब घंटे तक वह किसी आने-जानेवाले की राह देखता रहा, पर देहात का रास्ता रात को नही चलता । उसने सोचा, कब तक बैठा रहूँग, एक बजे रेल आती है, देर हो जायगी तो सारा खेल ही बिगड़ जायगा । अतएव वह हृदय में बल का संचार करके उठा और रामायण की चौपाइयाँ उच्च स्वर से गाता हुआ चला । भूत-प्रेत के विचार को किसी बहान से दूर रखना चाहता था । किन्तु ऐसे अवसरों पर, गर्मी की मक्खियो की भाँति विचार टालने से नही टलता । हटा दो, फिर आ पहुँचा थे । निदान वह सघन वृक्ष सामने दिखाई देने लगा । सदन ने उसकी ओर ध्यान से देखा । रात अधिक जा चुकी थी, तारों का प्रकाश भूमिपर पड़ रहा था । सदन को वहाँ कोई वस्तु न दिखाई दी, उसनें और भी ऊँचे स्वर में गाना शुरू किया । इस समय उसका एक-एक रोम सजग हो रहा था । कभी इधर ताकता, कभी उधर, नाना प्रकार के जीव दिखाई देते, किन्तु ध्यान से देखते ही लुप्त हो जाते । अकस्मात् उसे मालूम हुआ कि दाहिनी ओर कोई बन्दर बैठा हुआ है । कलेजा सन्न हो गया । किन्तु क्षणमात्र में बन्दर मिट्टी का ढेर बन गया । जिस समय सदन वृक्ष के नीचे पहुँचा, उसका गला थरथाराने लगा, मुँह से आवाज न निकली । अब विचार को बढाने की आावश्यकता भी न थी, मन और बुध्दि की सभी शक्तियों का संचय परमावश्यक था । अकस्मात् उसे कोई वस्तु दौड़ती नजर आई । वह उछल पड़ा, ध्यान से देखा तो कुत्ता था । किन्तु वह सुन चुका था कि भूत कभी कभी कुत्तों के रूप में भी आया करते है । शंका और भी प्रचंड हुई, सावधान होकर खड़ा हो गया, जैसे कोई वीर पुरुष शत्रु के वारकी प्रतीक्षा करता है । कुत्ता सिर झुकाए चुपचाप कतराकर निकल