पृष्ठ:सेवासदन.djvu/८६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
सेवासदन
१०१
 

वह सदनको उलझाये भी रखना चाहती थी । इस प्रेम कल्पना से उसे जो आनन्द मिलता था, उसका त्याग करनेमें वह असमर्थ थी।

लेकिन सदन उसके भावों से अनभिज्ञ होने के कारण उसकी प्रेम शिथिलता को अपनी धनहीनता पर अवलबित समझता था । उसका निष्कपट हृदय प्रगाढ़ प्रेम में मग्न हो गया था । सुमन उसके जीवन का आधार बन गई थी । मगर विवित्रता यह थी कि प्रेमलालसा के इतने प्रबल होते हुए भी वह अपनी कुवासनाओं को दबाता था । उसका अक्खड़पन लुप्त हो गया था । वह वही करना चाहता था जो सुमन को पसन्द हो। वह कामातुरता जो कलुषित प्रेम में व्याप्त होती है, सच्चे अनुराग के आधीन होकर सहृदयता में परिवर्तित हो गई थी, पर सुमन की अनिच्छा दिनों दिन बढ़ती देखकर उसने अपने मन में यह निर्धारित किया कि पवित्र प्रेम की कदर यहाँ नही हो सकती । यहाँके देवता उपासना से नही, भेंट से प्रसन्न होते है लेकिन भटके लिये रुपये कहाँ से आधे ? मांगे किससे ? निदान उसने पिता को एक पत्र लिखा कि यहाँ मेरे भोजन का अच्छा प्रबंध नही है, लज्जावश चाचा साहबसे कुछ कह नही सकता, मुझे कुछ रुपये भेज दीजिये ।

घरपर यह पत्र पहुँचातो मामा ने पति को ताने देने शुरू किये इसी भाई का तुम्हें इतना भरोसा था, घमंड से धरती पर पाँव नहीं रखते थे । अब घमंड टूटा कि नहीं ? वह भी चाचापर बहुत फूला हुआ था, अब आंखें खुली होगी। इस काल में नेकी किसी को याद नही रहती, अपने दिन भूल जाते है । उसके लिये ने कौन-कौन सा यत्न नही किया, छाती से दूध भर नहीं पिलाया। उसीका यह बदला मिल रहा है । उस बेचारे का कुछ दोष नहीं, उसे में जानती हूँ, यह सारी करतूत उन्ही महारानी की है । अबकी भेंट हुई तो वह खरी खरी सुनाऊँ कि याद करे ।

मदनसिंह को सन्देह हुआ कि सदन ने यह पाखंड रचा है । भाईपर उन्हें अखंड विश्वास था, लेकिन जब मामाने रुपये भेजने पर जोर दिया तो उन्हें जमे पड़े । सदन रोज डाकघर जाता, डाकिये से बारबार पूछता । आखिर चौथे दिन २५) का मनीआर्डर आया । डाकियां उसे पहचानता था,