पृष्ठ:सेवासदन.djvu/८५

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सेवासदन
 

इतने में सदन ने कमरे में प्रवेश किया । सुमन चौंक पड़ी । उसने सदन को कई दिन देखा था। उसका चेहरा उसे पद्मसिंह के चेहरे से मिलता हुआ मालूम होता था। हाँ उस गंभीरता की जगह एक उदंडता झलकती थी ? वह काइयाँपन, वह क्षुद्रता, जो इस माया नगर के प्रेमियों का मुख्य लक्षण है, वहाँ नामको भी न थी। वह सीधासादा, सहज स्वभाव,सरल नवयुवक मालूम होता था । सुमन ने आज उसे कोठों का निरीक्षण करते देखा था। उसने ताड़ लिया था कि कबूतर अब पर तौल रहा है, किसी छतरी उतरना चाहता है । आज उसे अपने यहाँ देखकर उसे गर्वपूर्ण आानन्द हुआ जो दंगल में कुश्ती मारकर किसी पहलवान को होता है । वह उठी और मुस्कुराकर सदन की ओर हाथ बढाया ।

सदनका मुख लज्जासे अरुणव हो गया । अखे झुक गई । उस पर एक रोब-सा छा गया । मुख से एक शब्द भी न निकला ।

जिसने कभी मदिरा का सेवन न किया हो, मदलालसा होनेपर भी उसे मुँह से लगाते हुए वह झिझकता है ।

यद्यपि सदन ने सुमनबाई को अपना परिचय ठीक नहीं दिया, उसने अपना नाम कुंवर सदनसिंह बताया, पर उसका भेद बहुत दिनों तक न छिप सका । सुमन ने हिरिया के द्वारा उसका पता भलो भाँति लगा लिया और तभी से वह बड़े चक्कर में पड़ी हुई थी । सदन को देखे बिना उसे चैन न पड़ता, उसका हृदय दिनोदिन उसको ओर खिंचता जाता था। उसके बैंठे सुमन के यहाँ किसी बड़े से-रईस का गुजर होना भी कठिन था । किन्तु वह इस प्रेम को अनुचित और निषिद्ध समझती थी, इसे छिपाती थी । उसकी कल्पना किसी अव्यक्त कारण से प्रेमलालसा को भीषण विश्वासघात समझती थी ? कही पद्मसिंह और सुभद्रापर यह रहस्य खुल जाय तो वह मुझे क्या समझेगे ? उन्हें कितना दु:ख होगा ? में उनकी दृष्टि में कितनी नींव अीर घृणित हो जाऊंगी ? जब कभी सदन प्रेमरहस्य की बात करने लगता तो सुमन बात को पलट देती जब कभी सदन की अँगुलियाँ ढिठाई करना चाहती तो वह उसकी और लज्जायुक्त ने देखकर वीरेसे उसका हाथ हटा देती । साथही,