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सेवासदन
१०९
 

इसके बाद डॉक्टर साहब अपने मुवक्किलो से बाते करने लगे; विट्ठलदास हॉट आध घंटे तक बैठे रहे, अन्त में अधीर होकर बोले, तो मुझे क्या आज्ञा होती है ?

श्यामाचरण-आप इतमीनान रक्खे, अवकी कौसिलकी बैठक मे मैं गवर्नमेंट का ध्यान इस ओर अवश्य आकर्षित करूँगा ।

विट्ठलदास के जी में आया कि डाक्टर साहब को आडे हाथो लूं, किन्तु कुछ सोचकर चुप रह गये । फिर किसी बड़े आदमी के पास जाने का सहस न हुआ । लेकिन उस कर्मवीर ने उधोग से मुहँ नही मोडा़ । नित्य किसी सज्जन के पास जाते और उससे सहायता की याचना करते । यह उधोग सर्वथा निष्फलतो नही हुआ । उन्हे कई सौ रुपये के वचन और कई सौ रुपये नकद मिल गये, लेकिन ३०) मासिक की जो कमी थी वह इतने धन से क्या पूरी होतो ? तीन महीने की दीड-धूप के बाद वह बडे़ मुश्किल से १०) मासिक का प्रबंध करने मे सफल हो सके ।

अन्त मे जब उन्हें अधिक सहायता की कोई आशा न रही तो वह एक दिन प्रातःकाल सुमनवाई के पास गये । वह इन्हे देखते ही कुछ अनमनी-सी होकर बोली, कहिये महाशय, कैसे कृपा की ?

विट्ठल--तुम्हे अपना वचन याद है ?

सुमन--इतने दिनो की वाते अगर मुझे भूल जायें तो मेरा दोष नही ।

विट्ठल-- मैने तो बहुत चाहा कि शीघ्र ही प्रबन्ध हो जाय,लेकिन ऐसी जाति से पाला पडा़ है । जिसमे जातियता का सर्वथा लोप हो गया है । तिसपर भी मेरा उधोग बिलकुल व्यर्थ नही हुआ । मैने ३०) मासिकका प्रबन्ध कर लिया है और आशा है कि और जो कसर है वह भी पूरी हो जायगी । अब तुम से मेरी यह प्रार्थना है कि इसे स्वीकार करो और आज ही नरककुण्डको छोड़ो दो ।

सुमन-- शर्माजी को आप नही ला सके क्या ?