पृष्ठ:स्टालिन.djvu/८

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में . अनुसार जर्मनी और रूस ने पूर्वीय यूरोप क्षेत्र को अपने २ प्रभाव क्षेत्र में बांट कर तय किया कि वह इस विषय में तीसरे राष्ट्र की वस्तन्दाजी न होने देंगे। इस माशातीत नाम की प्रसन्नता में स्टालिन ऐसा फूला कि वह अपनी नीति को भूज कर लोभी ज्वारी के समान फिनलैंड पर चढ़ दौड़ा। यद्यपि यहां उसे अच्छी तरह लोहे के चने चबाने पड़े, किन्तु उसके मित्र हिटलर ने उसको इस आपत्ति से भी बचा कर विजय दिलवा ही दो। स्टालिन का उत्साह इस दूसरे नाम से इतना अधिक बढ़ा कि उसने पुराने पार सामान्य को फिर अपने शासन में लाने का हद संकल्प कर लिया। अब की बार उसने अपनी कूट राजनीति का वह पासा फेंका कि २२ जुलाई १९४० को लिथुआनिया, एस्टोनिया और लटविया के तीनों बाल्टिक राज्यों की अपनी २ पार्लमेंटों ने सर्व सम्मति से अपने २ यहां सोवियट जन तंत्र बनाने का निर्णय किया। अपनी पश्चिमी सीमा से निश्चित होते ही स्टालिन ने पूर्वीय सीमा को ओर भी ध्यान किया। उसने २६ जून १६४० को रूमानिया को युद्ध की धमकी देकर उससे अपने पुराने रूसी प्रांत बेसरबिया तथा उत्तरी बुकोविना की मांग की। रूमानिया ने विवश होकर इस मांग को अगले ही दिन २७ जून को स्वीकार कर लिया । स्टालिन ने २ जुलाई १९४० तक इस प्रदेश पर अधिकार करके प्राचीन सम्पूर्ण पार सामान्य को अपने भाषीन करन की अपनी प्रतिक्षा को पूर्ण किया । किन्तु इन नगातार मिलने वाली सफलताओं से उसकी साम्राज्य लिप्सा बराबर बढतो ही गई। इस समय जर्मनी के उद्योग से इटली भो युद्ध में उतर चुका था और जापान ब्रिटिश तथा पच सामान्य को चुनौती दे रहा था। यह जान पड़ता है कि इस समय इन चारों ने ही पारस्परिक परामर्श से अपने २ प्रभाव क्षेत्र को