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पदि मनुज आज वैसा ही है, तो ऊध्व-गमग है कहाँ, कहो ? वह गुहा गनुज ही तो है जो प्रासादो मे है यहाँ, अहो 2 1 जग ने सोचा कि गुहा छोटे हो गये सहसा गवन्तर, मानव इतना बड आया है बदला होगा कुछ अभ्यन्तर पर, बवरता औ' संस्कृति में, जैसे, है बँधी एक डोरी, मानो, रेंग नही सका गहरो, मानय अपनी चादर कोरी। मानो, वह गुहा द्वार फिर जा पहुंचा है आज वही, जैसे, उन्नति का ऊर्ध्व पन्थ यह वैढ सका है अभी नहीं। से चल, मानवता ने सुलगायी है निज बुद्धि-ज्वाल दुदन्ति, चण्ड, प्रज्वलित हो उठी है होली हरहर हर-हर करती अखण्ड । वो बुद्धि मनुज ने अति विकसित, पर, रागानुरक्त, फल भोगे, अब, जब किया आज मानव ने जीवन यो विभगत, हम विपपायी जनम क १३१