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बुद्धि-विलासी हुआ जीव यह एका सहज नैतिक विकास-क्रम बड पार गस्तिष्क मे हृदय के भागे फैलाया हे सम्नम, अय-दास्य से मुक्ति-मात्र क्या फैला सकती है सुख जग मे? जय कि अथरपणा धुसी है इत मानवता की रग-रग भै? जन-शोषण-विनाश-क्रम कैवल नही वहिस्साधनावलम्वित, है सवथा असम्भव जव तक अन्तस्तल भी हो न अकम्पित, इस आन्तरिक शुद्धि का तुमने क्या उपाय सोचा है? बोलो। अपने क्रान्तियाद को ले कर मत्य तुला पर तो कुछ तौलो, सदन। गजन यह क्रान्ति है कि तुम करोगे, हिंसा से हिंसा का क्रान्तिवाद गया यही कि पहरे इधर-उधर तोपो का 7 सोचो तो यह क्राति पौन-सा पावन नवल मैदेसा लायो? नभ का बक्षम्पक तो वो ही सदियो से कम्पित है भाई, धम विषधारी जगम के