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पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/१००

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इस नियम के अनुसार मध्य शब्द का अन्त्य 'ध्य' जब 'ज्झ' से बदल जाता है, तो मज्झ शब्द बनता है, यथा—बुध्यते, बुज्झते, सिध्यति- सिज्झति इत्यादि। यही मज्झ शब्द ब्रजभाषा और अवधी में माँझ, और अधिक कोमल होकर माँह, माहिँ आदि बनता है। इसी माँह, माँहि से मैं और में की उत्पत्ति भी बतलाई जाती है। प्राकृत की सप्तमी एक वचन में "स्मिं" का प्रयोग होता है कुछ लोगों की सम्मति है कि प्राकृत के स्मिं अथवा म्मि से में अथवा मैं की उत्पत्ति है[]

विभक्तियों के विषय में यद्यपि यह निश्चित है कि वे संस्कृत अथवा प्राकृत से ही हिन्दी अथवा अन्य गौड़ीय[]

भाषाओं में आई हैं। परन्तु कभी कभी विरुद्ध बातें भी सुनाई पड़ती हैं, जैसे—यह कि द्राविड़ भाषा के सम्प्रदान कारक के 'कु' विभक्ति से हिन्दी भाषा के 'को' अथवा बँगला भाषा के 'के' की उत्पत्ति हुई। ऐसी बातों में प्रायः अधिकांश कल्पना ही होती है। इसलिये, उनमें वास्तविकता नहीं होती, विशेष विवेचन होने पर उनका निराकरण हो जाता है। तो भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अबतक निर्विवाद रूप से विभक्तियों के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। जितनी बातें ज्ञात हो सकी हैं, उनका ही उल्लेख यहां किया जा सका।

सर्वनाम भी भाषाके प्रधान अंग हैं, और किसी भाषाके वास्तविक स्वरूप ज्ञान के लिये क्रिया सम्बन्धी प्रयोगों का अवगत होना भी आवश्यक है, इसलिये यहां पर कुछ उनकी चर्चा भी की जाती है।

उत्तम पुरुष एक वचन में 'मैं' और बहुवचन में 'हम' होता है, संस्कृतके 'अस्मद्' शब्द से दोनों की उत्पत्ति बतलाई जाती है। प्राकृत में तृतीया के एकवचन का रूप 'मया', और बहुवचन का रूप 'अम्हेहि', और 'अम्हेभि होता है। प्रथमा के बहुवचन का रूप 'अम्हे, है[] अपभ्रंश में यह "मया"


  1. देखिये पालि प्रकाश पृ॰ ८४ हिन्दीभाषा और साहित्य पृ॰ १४७,
  2. हार्नली साहब ने निम्नलिखित भाषाओं को गौड़ीयभाषा कहा है सुबिधा के लिये इन भाषाओं को हमभी कभी कभी इसी नाम से स्मरण करेंगे।
    उड़िया, बँगला, हिन्दी, नेपाली, महाराष्ट्री, गुजराती, सिंधी, पंजाबी, और काश्मीरी।
  3. देखिये 'पालिप्रकाश' पृ॰ १५३।