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पृष्ठ:हिंदी शब्दानुशासन.pdf/४६

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पूर्व-पीठिका


जिस भाषा का यह व्याकरण है, उसका जन्म, जन्मस्थान, विकासक्रम श्रादि समझ लेने से आगे बड़ी सुविधा मिलेगी और प्रदिपाद्य विषय सामने थिरकने लगेगा । इसलिए, वैसी कुछ आवश्यक प्रासंगिक इच अत्यन्त संक्षेप में यहाँ की जाएगी।

हिन्दु र उत्पत्ति ---हिन्दी की उन्नति उस संस्कृत भाषा से नहीं है, जो कि वेदों में, उपनिषदों में तथा वामोकिं या कालिदास श्रादि के काव्य-ग्रन्थों में हमें उपलब्ध है। यति' से करता है' एकदम कैसे निकल पडेगः । ‘रामः कति’ की तरह ‘सीता क्लरोति' भी संस्कृत में चलता है, परन्तु हिन्दी में ‘लड़ चलता है, करता है, ताता है और लड़की चलती है, कृरती है, खाती है होता है । किन अन्तर ! यह ठीक है कि ‘ल, खा, कर शब्द-रूम संस्कृत के 'चलू , क्ल, वाद्’ से मिलते-जुलते हैं । परन्तु इस मेल-जोल का यह मतलब नहीं कि ‘चलति से चलता है' निकल पड़ः १ दोनों.की बाल एकदम अलग-अलग है । रवः ॐ श्रर दही में अंतिम समान है, स्वाद से भी कुछ वैसा अभास समझदार को कदाचित मिल जाए और दोनों को इकू पात्र में घोलने पर भी रंग-रूप में समता नजर अायो । वैज्ञानिक विधि से विश्लेषण करने पर तो प्रत्यक्ष ही हो जाएगा कि दोनों पदार्थों का मूल तत्व एक ही है । परन्तु यह सब कुछ स्पष्ट हो जाने पर भी कोई यह न कहेगा कि रबड़ी से दही बनाई हैं। इतना ही कहा जाएगा कि जिस भूल पदार्थ से बड़ी बनी है, उसी से दही बना है !

यही स्थिति संस्कृत और हिन्दी की हैं । दोनों का पृथक और स्वतंत्र.पद्धति पर विकास हुआ है; परन्तु हैं दोनों एक ही मूल भाषा की शाखाएँ। बहुत बड़ी-बड़ी शाखाएँ हैं ये; इतनी बड़ी कि तना कहीं दिखाई भी नहीं देता और इतना विस्तार कि कोई सहसा समझ नहीं पाता कि कहाँ से ये चली हैं।

संसार में सबसे पहले मानवता ने विकास कहाँ प्राप्त किया, यह प्रश्न होने पर कोई भी कह देगा कि जहाँ भाषा का प्रादुर्भाव हुआ ! परन्तु भाषा का प्रादुर्भाव कहाँ पहले हुआ, यह भी तो पूछा जागा न ! इसका भी उबर है। जहाँ का साहित्य सङ्गसे पुराना है, वहीं भाषा ने सबसे पइले कृपा की । भाषा