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नई धारा

अथवा मद में झूमने (या 'झीमने') वाले कवि नहीं। सब प्रकार की उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह, दोनों इनमें हैं। इनकी रचना के कई प्रकार के नमूने नीचे दिए जाते हैं-

क्षत्रिय! सुनो, अब तो कुयश की कालिमा को मेट दो।
निज-देश को जीवन सहित तन मन तथा धन भेंट दो।
वैश्यो! सुनो व्यापार सार मिट चुका है देश का।
सब धन विदेशी हर रहे हैं, पार है क्या क्लेश का?

(भारत-भारती)

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थे, हो, और रहोगे जब तुम, थी, हूँ और सदैव रहूँगी।

कल निर्मल जल की धारा सी-आज यहाँ, कल वहाँ बहूँगी।
दूती! बैठी हूँ सज कर मैं।

ले चल शीघ्र मिलूँ प्रियतम से धाम धरा धन सब तज कर मैं।
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अच्छी आँख-मिचौनी खेली!
बार बार तुम छिपो और मैं खोजूँ तुम्हें अकेली।
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निकल रही है उर से आह।
ताक रहे सब तेरी राह।

चातक खड़ा चोंच खोले है, संपुट खोले सीप खड़ी,
मैं अपना घट लिए खड़ी हूँ, अपनी अपनी हमें पड़ी।

(झंकार)

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पहले आँखों में थे, मानस में कूद मग्न प्रिय अब थे।

छींटे वही उड़े थे, बड़े-बड़े अश्रु वे कब थे।

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