पृष्ठ:हिन्दी भाषा की उत्पत्ति.djvu/१६

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हिन्दी भाषा की उत्पत्ति।


लगाना-और फिर ऐतिहासिक पता, ऐसा वैसा नहीं--बहुत कठिन काम है। मैक्समूलर, काल्डवेल, बीम्स और हार्नली आदि विद्वानों ने इन विषयों पर बहुत कुछ लिखा है और बहुत-सी अज्ञात बातें जानी हैं, पर खोज, विचार और अध्ययन से भाषाशास्त्र-विषयक नित नई बातें मालूम होती जाती हैं। इससे पुराने सिद्धान्तों में परिवर्तन दरकार होता है! कोई-कोई सिद्धान्त तो बिलकुल ही असत्य साबित हो जाते हैं। अतएव भाषाशास्त्र की इमारत हमेशा ही गिरती रहती है और हमेशा ही उसकी मरम्मत हुआ करती है।

आजकल हिन्दी की तरफ़ लोगों का ध्यान पहले की अपेक्षा कुछ अधिक गया है। सारे हिन्दुस्तान में उसका प्रचार करने की चर्चा हो रही है। बंगाली, मदरासी, महाराष्ट्र, गुजराती सब लोग उसकी उपयुक्तता की तारीफ़ कर रहे हैं। ऐसे समय में इस बात के जानने की, हमारी समझ में, बड़ी ज़रूरत है कि हिन्दी किसे कहते हैं? हिन्दुस्तानी किसे कहते हैं? उर्दू किसे कहते हैं? इनकी उत्पत्ति कैसे और कहाँ से हुई और इनकी पूर्ववर्त्ती भाषाओं ने कितने रूपान्तरों के बाद इन्हें पैदा किया?

इन विषयों पर आज तक कितने ही लेख और छोटी-मोटी पुस्तकें निकल चुकी हैं। पर उनमें कही गई बहुतसी बातों के संशोधन की अब ज़रूरत है। इस देश की गवर्नमेंट जो यहाँ की भिन्न-भिन्न भाषाओं और बोलियों की परीक्षा कराकर उनका इतिहास आदि लिखा रही है उससे कितनी