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हिन्दी भाषा की उत्पत्ति ।


व्रज-भाषा के बोलनेवाले हैं। पुराने ज़माने में शूरसेन देश के एक भाग का नाम था व्रज। उसी के नामानुसार व्रज-भाषा का नाम हुआ है। इस भाषा के कवियों में सूरदास और बिहारी सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। अँगरेज़-विद्वानों की, विशेष करके ग्रियर्सन साहब की, राय में सूरदास और तुलसीदास का परस्पर मुक़ाबला ही नहीं हो सकता; क्योंकि उनकी राय में तुलसीदास केवल कवि ही न थे, समाज-संशोधक भी थे। मनुष्य के मानसिक विकारों का जैसा अच्छा चित्र तुलसीदास ने अपनी कविता में खींचा है वैसा और किसी से नहीं खींचा गया।

क़न्नौजी

क़न्नौजी, व्रज-भाषा से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। इटावा से इलाहाबाद के पास तक, अन्तर्वेद में, इसका प्रचार है। अवध के हरदोई और उन्नाव ज़िलों में भी यही भाषा बोली जाती है। हरदोई में ज्यादह उन्नाव में कम। इस भाषा में कुछ भी साहित्य नहीं है। कोई १०० वर्ष हुए श्रीरामपुर के पादरियों ने बाइबल का एक अनुवाद इस प्रान्तिक भाषा में प्रकाशित किया था। उसे देखने से मालूम होता है कि तब की और अब की भाषा में फ़र्क़ हो गया है। कितने ही शब्द जो पहले बोले जाते थे अब नहीं बोले जाते।

बुँदेली

बुँदेली बुँदेलखण्ड की बोली है। झाँसी, जालौन, हमीरपुर और ग्वालियर राज्य के पूर्वी प्रान्त में यह बोली जाती है। मध्यप्रदेश के दमोह, सागर, सिउनी, नरसिंहपुर ज़िलों की भी