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१६६६ ई०में उड़िसाके बागी अफगानोंने ५ हजार मुगल सेनाको हरा इस नगरको लूटा। कहा जाता है, कि युवराज आजिम उस्सानने गुप्तरूपसे मुर्शिदकुलीको मारना चाहा। मुर्शिद ढाकासे यहां भाग आया। उसके यत्नसे मुक्सुवाद महलोंसे सुशोभित मुर्शिदाबाद हो गया। इससे यह अनुमान होता है, कि उस समय मग और पोर्तु गीज डकैतोंका उपद्रव कम हो गया था जिससे राजसीमाकी रक्षा करना उतना जरूरी नहीं समझा जाता था। मुर्शिद ने सोचा कि, यहांसे बङ्गाल, बिहार और उड़िसाका शासन करने में सुविधा होगी और हुगली किनारके शहर तथा गावोंके साथ खूब व्यापार चलेगा। सम्भवतः यही विचार कर उसने यहां राजधानी बसाई थी। इस शहरके नवाबी कीर्त्तियोंमें वर्तमान निजामत प्रासाद, निजामत किला, आइना-महल, अन्दर महल, निजामत कालेज और इमामवाड़ा आदि विशेष कर उल्लेखयोग्य है। १८३७ ई०में जेनरल मकल्युडकी देखरेखमें पुराने प्रासादोंकी मरम्मत होने लगी जिसमें १० लाख ६७ हजार रु० खर्च हुए। नवाब सिराजउद्दौलाकी बनाई इमामवाड़ा मसजिद मुहरममें आतशबाजोके समय जल गई जिसकी मरम्मतमें १८४७ ई०को ६ लाख रु० खर्च हुए। यह हुगलीके प्रसिद्ध इमामबाड़े से बहुत बड़ी है। नवाब सिराज इसमें जितना धनरत्न आदि छोड़ गया था उसमें अधिकांश मीरकासिमने बेच दिया । मुहर्रमके समयमे अनेक स्थानोंसे लोग यहां जमा होते है। इसके अलावा ख्वाजा खिजिरके उत्सव समयमें बड़ा समारोह होता है। इसमें पौष संक्रान्तिकी हिन्दू-प्रथाके जैसे नदीजलमें दीप बहाये जाते हैं। इसके बाद मुबारक मंजिलको मणिवेगम मसजिद,मनसूरगंजका मोती-झीलप्रासाद, भागीरथी किनारे के खुशबागका समाधिमञ्च देखने योग्य है। मोती झील पर पहले नयाजिस मह् मदने अपने रहनेके मकान बनवाये थे। पीछे गौड, नगरकी पठान कीर्तिके ध्वंसाव शेषसे सिराजउद्दौलाने मोती झील, प्रासाद और मनसूर गञ्जनगर स्थापित किये। इस प्रासादसे ही वह पलासीके युद्धक्षेत्र में उतरा था। यहां ही कर्नल क्लाइवने मीरजाफर- Vol. XVIII. 32
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को सूवेदारी मसनद पर बैठाया था। यहीं रह कर बङ्गालके दीवान लार्ड क्लाइवने कम्पनीको ओरसे पहले पहल कर वसूल किया था। यहां लार्ड वार्नहेप्टिग्स और सर जान्साेर १७७१-७३ ई०में रह गये हैं। मुलकी ( अ० वि० ) १ मुल्की देखो । २ देशी ।
मुलकी―मान्द्राज प्रदेशके दक्षिण कणाड़ा जिलान्तर्गत एक नगर । यह अक्षा० १३°५' १५" उ० तथा देशा० ७४°४६'३५" पू०के मध्य अवस्थित है। मङ्गलृरसे यह ६॥ कोस उत्तर समुद्रकी खाड़ी पर बसा हुआ है।खांडीके पास ही समुद्रगर्भसे कुछ पर्वतश्रृङ्ग देखे जाते हैं जो मुलकी चा ‘प्रिमिरा रक’ नामसे प्रसिद्ध है।
मुलगुन्द―बम्बई प्रदेशके धारवार जिलान्तर्गत एक नगर। यह अक्षा० १५°१७' उ० तथा देशा० ७५°३६' पू०के मध्य अवस्थित है। यह स्थान एक समय तासगांव सामन्तराजके अधीन था । १८४५ ई० में यहांके सरदार वंशके कोई उत्तराधिकारी न रहनेके कारण यह स्थान वृटिशसाम्राज्यमें मिला लिया गया।
मुलजिनापुर―गुजरात प्रदेशके महिकान्य पोलिटिकल एजेन्सीके अन्तर्गत एक सामन्तराज्य । बड़ौदापति गायकवाड़ को ये कर देते हैं।
मुलजिम (अ० वि०) अभियुक्त, जिस पर कोई अभियोग हो।
मुलतवी (फा०वि०) जो कुछ समयके लिये रोक दिया गया हो, जिसका समय टाल दिया गया हो।
मुलतान-मूलतान देखो।
मुलतानी ( हिं० वि०) १ मुलतानका, मुलतान संबंधी। (स्त्री०) २ एक रागिणी। इसमें गांधार और धैवतं कोमल, शुद्ध निषाद और तीव्र मध्यम लगता है। इनके अतिरिक्त तीनों स्वर शुद्ध होते हैं। शास्त्रमें इसे श्रीराग की रागिणी कहा है। हनुमत्के मतसे यह दीपक राग की रागिणी है। इसके गानेका समय २१ से २४ दएड तक है। ३ एक प्रकारकी बहुत कोमल और चिकनी मिट्टी। यह खास कर मुलतानसे आती है। इसका रंग बादामी होता है और यह प्रायः सिर मलने में साबुनकी तरह काममें आती है। इससे सोनार लोग साेना साफ करते। छीपी लोग अनेक प्रकारके रंगों में अस्तर देने और साधु आदि इससे कपड़ा रंगते हैं।
मुलना ( अ० मु० ) मौलावी, मुल्ला ।
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