पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१९१

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वायुविज्ञान १७. एक सेरके अन्दाज जलीय बाप्प निकलता है। देहका है। इससे धर्माधिषय, रकस्राय और श्लेष्माक्षरण हो मायतन, उत्ताप और वायुको शीतोष्णताको न्यूनाधि | मरते हैं। फताके अनुसार "जलोय यापफे निकलनेका भी तार- (२) फैशिफाओंके कार्य-शैथिल्य निवन्धन हद्- . तम्य दिम्गाई देता है। स्पन्दन, घनश्यास मोर ध्यासकच्छ हो सकता है। पुस्कुस का याय-शोधन। (३) वायुका चाप कम होने पर उसमें अक्सिजन- ..प्रतिभ्यासमें प्रायः पांच सौ घन सेण्टिमिटर वायु की माला भी कम हो जायेगी। अला परिमित अपिस. - फुस्फुसमें भाती है और फुस्फुमफे मध्यस्थित दूपित जन ग्रहण कर देहको यथार्थ कायोनिक एसिड बाहर घायुसे मिलती है। इससे कार्यो निक पसिडका भाग | करनेको पूर्ण सुविधा नहीं मिलती। इससे देहमें अधिक हो जाता है। प्रश्वासके द्वारा दूपित पायुका | कायों निक एसिड विष सञ्चित होती है और इससे बहु- सवश थाहर नहीं निकल पाता । अतएव प्रत्येक वारके तेरे अमङ्गल होते हैं। निध्यासमें यायु फुस्फुस मध्यस्थित दुषित वायुके दश (४) अक्सिजनको कमोसे भेगस स्नायुफा मूलदेश भागके एक भागके साथ मिल जाती है। अतपय माठ. उत्तेजित होता है और इससे विवमिपा और चमन सं दश पार तक भ्यासक्रिया करने पर फुस्फुसकी यायु उपस्थित होता है। विशोधित है। यहां हमारे पोगशास्त्र के प्राणायाम | . (५) यायु प्रकोपके हासमें दैदिकयन्त से शोणित- प्रणाली अनेक सूक्ष्मतत्त्वों पर सूक्ष्म रूपसे विचारने प्रयाद पाहरकी भोर भारट होता है, मस्तिष्ककारक को जरूरत है। प्राणायाम प्रणालीमें बहुतेरे सूक्ष्मतत्त्य ! प्रवाह-हास होता है, इसके फलस मूच्छा क्षीण दुष्ट निहित हैं। आदि नाना प्रकार के दुर्लक्षण दिखाई देते है। • पायुके चापकी कमी भौर उसका अशुभ फल । पायुका चापाधिक्य भौर अशुभ फल । मनुष्य घायुके समुदगर्भ में - यसता है। हमारी देहके घायुफे चापको अधिकतासे भी यदुत भशुभफल प्रत्येक वर्ग:च स्थानके हिसाबसे माय: साढ़े सात सर होता है। उच्च स्थानमें जैसे वायुका चाप कम हो जाता पायुमण्डलका चाप (दवाय) ( Pressure) है । अतः है। भूगर्भ में, समुद्रक नीने खान या गहरे कुएं में यायु- सारी देह पर वायुमण्डलीफे चापका परिमाण ३०से ४० का चापाधिक्य होता है। इन सय स्थानों में प्रति वर्गव हजार पाउण्ड है। एक पाउण्ड साध सेरका होता है। परिमाण स्थानमें पायुमण्डलीका ६०७० पाउण्ड चाप .. सका हम लोग जरा भी अनुभव नहीं करते, कि हमारे हो सकता है। चापाधिक्यसे त्यफ रकशन्य होता है। चारों भोर इतना घायुका चाप है। मछली जैसे जाटममपसीना बन्द होता, यासफिया कम हो जाती, निभ्यास में यास कर जलके भारको परवाह नहीं करतो, फुरसे सहज और प्रध्यास त्याग करनी पलेश होता है। निश्वास - जल से भरा घड़ा बोचनेफे समय जैसे जल के भीतर और प्रभ्यासके विरामका समय सुदीर्घ हो जाता है। घड़े का भार मालूम नहीं होता, किन्तु जलफ बाहर जव | फुस्फुसका आयतन बढ़ता, पेशायकी वृद्धि और हपिएड घड़ा खोंच पाता है, तब घड़े में भरे जलका भार मालूम | धीरे धीरे कार्य करने लगता है। पायुके बापाविषयमय होता है, धैसे हो हम वायुफे समुद्र में विचरण कर रहे है। स्नानमें वास करना जिनका सम्पास है, उनके सहसा - और वायुफे भारको उपलब्धि नहीं कर सकते । वायु- ऊपर उठ माने पर उनको देहको स्वफर्म पकाएक रक मा गएडलीका यह पाप क्षमारी देवके लिये अभ्यासपशतः उपस्थित होता है। नाक मुहम रक्तस्राव हो सकता है। • प्रपोजनीय हो गया है। प्रत्युत इस चापकी कमी होने स्नायुमएडलो. रकाल्पतायात पक्षाघात ( लकया) पर हम लोगोंको अमुविधा होती है। रोग भी उपस्थित हो सकता है भपिसान हमारे लिये . वायुमण्डलका प्रभाय कम होने पर मानवदेहदो पहुत ही हितकर है। किन्तु परिमाणाधिपय होने पर शिकामे और श्लेमिक मिलोमें रकाधिषर हो जाता। इससे भी हमारा जीयान हो जाता है। मत्यन्त चाप