पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१९९

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वायुविज्ञान १७७ - जनीय वापका प्रमाण । . . . . होनेसे वाप्पोद्गममें यथेष्ट वाधा उत्पन्न होती है । यायु डाक्टर डाल्टनका कहना है कि फारनहोटके २१२ | पाप्पमें परिपूर्णरूपसे सिक होने पर भी वाणोदममें डिग्रोफे तापसे प्रति मिनट ४.२४४ प्रन जल वाप्पम परि- व्याघात उपस्थित होता है। णन होता है। सूर्योत्तापते जो जल वाष्प बन जाता ' - शोतकालमें वायु बहुत शुष्क होती है। इमोलिये है। आन सहजमें हो.उसकी परीक्षा की जा सकती है। | शीतकालमें बहुत चाप उत्पन्न होता है। प्रामवायुको ...: जलीय वाष्पकी उत्पत्ति । . उष्णता हो अधिक परिमाणसे याप्पोद्गम होनेका कारण • जलकै साथ तापका स्पर्श हो इस बाप्पोत्पत्तिका एक- है। किन्तु इस समयमें घायुराशि शीत ऋतुमे उत्थिन मात्र कारण है। अग्निके ताप, सूर्यके ताप, देदिक ताप, याप्पराशिक द्वारा परिमिक्त रहती है, अतएव वायुमें भूमिफे अपन्तरस्थित ताप आदि द्वारा विविध प्रकार अधिक चार मिश्रित हो नहीं सकता। इसीलिये फे,जलीय पदार्थ उत्तम हो कर.पापरूपमै परिणत होते । 'जलाशय मादि शो 'कालमें जितने सूबते ५, प्रीष्मकाल- है। प्रश्वासयायुफे द्वारा भी घायुमें जलोय याप्पको मात्रा में उतना नहीं सूत्रते। इसी तरह शोत-प्रोमजात याप्प वंढ़ जाती है। स्वास ही दैहिक जलीय पदार्थ याप्प यनि वृष्टिरूपसे गिरता है। हमें आकाशमें इस जलीय रूपसे बाहर हो कर वायुसे मिल जाता है । लफड़ी, कोयला पापक विविधरूप दिखाई देते हैं, जैमे-मेघ, वृष्टि और कई तरह के दीपोंके जलाने से भी जलीय वापसी शिशिर, छिन्न तुपार और शिला आदि । जलोय यार. उत्पत्ति होती है। समुद्र तथा तालाब आदि जलाशयों को बात कहने पर इन सब बातोंको कुछ सालोचना इस प्रकार जितना जल मिस यापमें परिणत हो मासाश करना आवश्यक है। में उड़ जाता है, उसकी आलोचना करने पर विस्मित कुहरा । होना पड़ता है। वैज्ञानिकोंने अनुमानिक गणनामे मिद्धान्त . पहले कुदरेको यात लिखी जाती है। पाश्चात्य वैशा. किया है २, ०५, २,००,००,००,००,० (२ मोल ५ वर्ष २ -निकोंने इसके सम्बन्ध में यहुनेरी आलोचनायें की हैं। ऊपरी अर्थ ) मन जल वापसे ध्या पर गिरता है। सिवा । भागमें जो जलीय पापराशि वायुको स्वच्छतामें बाधा इसके करोड़ों मने जल शिशिर, तुपार, छिन्न तुपार, हालनो है, उसीको साधारणतः कुहरा कहने हैं। कुदरे शिलावृष्टि, कुहरे आदि परिणत होता है। विशाल विपुल मौर वृष्टि में घोड़ा ही प्रार्थक्य है। आकाशके ऊपरी आकाशकी यायुराशिम वापरूपमें इतना अधिक जल स्तरमें जो घनोभूत चापराम्रिमण करता है, उसीको रहता है। इससे स्पट प्रतीत होता है, कि नित्य पृथ्यासे मेघ रहते हैं। कुदरे भी मेघ है मही, किन्तु यह भूमागके एक खर्च. मग और प्रति घण्टे में ४,१६,६६.६६६६६६ / अति निकट दो सञ्चित होता है. कुहरा शतम जल- 'मग जल वायुराशिक साश. यावाकारमें मिल जाता विन्दुको ( Aqnous Spherules) समष्टि है। यह सब है। सूर्य किरण ही इस जलाकर्षणका प्रधानतम हेतु जलबिन्दु इतने छोटे है, कि विना मणुषोक्षण दिखाई है। पृषि शिशिर, तुपार, शिला, कुहरे मादिका मूल कारण नहीं देते । जिस कारणसे गिगिरकी उत्पत्ति दोती है, यद जलीय पाप है। पाप आवृत स्थानापेक्षा अनावृत उसके विपरोत हेतुसे हो कुहरा उत्पन्न होता है। गाई स्थानमें अधिक परिमाणसे उत्पन्न होता है। जिस जलसे भूभागका सापमानकी (Temperature) तत्मंलग्न यायुः याप उत्पन्न होता है, उसके निकट चारों ओर यदि उग्ण राशिके उष्णतामानको अपेक्षा पुछ अधिक होने से कुहरेको पायु प्रयादित होती तो उससे शीघ्र शीघ्र यार उत्पन्न | उत्पत्ति होती है। बाद भीर अपेक्षाहन अधिक उत्तप्त होता है। गमोर पात्रको अपेक्षा लिडले पाबमें बहुत | भूमागसे उद्भूत जलीय याप निकटस्थ शोनल यायुके अगर यापान होता है। यायुफे माहाय्यसे भो स्पर्शसे घनीभूत होता है और छोटे टोटे जसविन्दुमोमें थार उत्पन्न होता है।जल और घायुषी उar यरायर परिणत होता है, वही कुहरा है। कुदरेके उद्गम लिये दोनेसे जलकी भपेक्षा यायु-१५ सापांशसे अधित शीतल | दो अयस्यायें प्रयोजनोय है। ऊपरको पायुराशिको .'.-Vol. XxI. 45.