पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४११

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विडातल-विडम्पक ३४१ . भस्मक, वैल, मोघा, तण्डल, जन्तुम्न, चित्रतण्डुल, क्रिमि-| .. इस औषध सेवनसे आमवात, शोथ, अग्निमान्य शत्र, गद्दभ, फैबल, यिडिङ्गा, फ्रिमिहा, चित्रा, तण्डुला, और हलीमक रोग शान्त होते हैं। तण्डूलीयका, चातारितण्डुला, जन्तुघ्नो, मृगगामिनी, . . (भैषज्यरतना० आमवातरोगाधि०) कैरालो, गहरा, कापाली, वरासु. चित्रवीजा, जन्तुहन्ती। दूसरा तरीका-विडङ्ग - त्रिफला, माथा, पिप्पली, , गुण-कर उष्ण, लघु, यातकफपोड़ा, अग्निमान्य, सौंठ, जीरा और मगरैला, कुल मिला कर जितना हो अरुचि, भ्रान्ति और कृमिदोपनाशक । (राजनि०) थोड़ा. उतना लोहा इन्हें पफल मिश्रित कर यह भौषध वनानी तिक्त, रुमि और विषनाशक ।- (राजव०) भावप्रकाश होगी। इस औषध सेवनसे प्रमेह रोग नष्ट होता है। के मतसे कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, रुक्ष, अग्निवर्द्धक, लघु, इसको मावा रोगोकं बलायलके अनुसार और गनुपान शूल, माध्मान, उदर, श्लेष्म, मि और विवन्धनाशक || दोपके वलायलके अनुसार स्थिर करना होगा। (भावम० ) (नि०) २ मभिज्ञ, जानकार (रसेन्द्रसारस० प्रमेहरोगाघि) विङ्गतेल (स' क्लो०) तेलोपविशेष । प्रस्तुत प्रणालो- तीसरा तरीका-पिङ्ग, हरीतकी, आमलकी, बहेड़ा, . सरसों तेल ४ सेर, गोमूत्र १६ सेर, पलका विडंग, देवदारु, दारुहरिद्रा, सौंठ, पीपल, मिर्धा, पोपलका मूल, गन्धक, मनःशिला मिला कर एक सेर। तैलपाकके चई, चितामूल, ये मव द्रव्य समान भाग तथा उतने ही विधानानुसार यह तेल पाक करना होगा। यह तेल | लोहेको एक साथ मिला कर अठगुने गायके मूतमें पाक सिरमें मालिश करनेसे सभी जू मर जाती है । (भ पज्य करे। पाक शेष होने पर २ तोलेकी गोली बनाये । इसका रत्ना० कृमिरोगाधिक) सेवन करनेसे पाण्ड, और कामला आदि रोग प्रशमित विडङ्गादि तैल (स० लो०) तेलोषविशेष। इसके | होते हैं। (रसेन्द्रसारस० पायहुरेरोगाधिका०) पनानेको तरकोथ-तेल ४ सेर, फल्कार्थ विडङ्ग, मिर्च, बिडकारिष्ट (सं० पु०) प्रणशोथाधिकारोक्त औपघ. .यकवनकी जड़, सोंठ, चितामूल, देवदार, इलायची और विशेष । प्रस्तुत प्रणाली-चिड़ा, पीपलमूल, रास्ना, पञ्चलवण मिला हुआ १ सेर । तैलपाकफे विधानानुसार कूटजकी छाल, इन्द्रयव, आकनादि, एलवालुक, माम- , यह तेल पाक करना होगा। यह तेल मालिश करने | लकी, प्रत्येक द्रव्य ४० तोला ले कर ५१२ सर या १२ मन - और पीनेसे श्लोपन (फ़ोलपराय) रोग विनष्ट होता है। । ३२ सेर जलमें पाक करें। जव पाक हो कर शेप ६४ सेर (भैषज्यरत्ना० स्लीपदरोगाधि०) (१॥४ सेर) रह जाय, तव नीचे उतार ले। टएडा विड़गादिलोह (स० ली० ) औषधविशेष । प्रस्तुत-| होने पर उसे छान कर घयफूल का चूर्ण २॥ सेर, दार- प्रणाली-लोहा ४ पल, अवरक २॥ पल, त्रिफला प्रत्येक चीनी, इलायची, तेजपत्र प्रत्येक १६ तोला, प्रियंगु, रक्त बा पल, जल. ३६० पल, शेष ४५ पल । इस पयायमें काञ्चनछाल, लोध प्रत्येक ८ तोला, सोंट, पीपल, मिर्च, लोहे और अवरको पाक करे। इन सब थ्यों को लोहे । प्रत्येक १ सेर, ये सब चर्ण तथा मधु ३७॥ सेर उसमें या तायेके परतनमें धीमी आंच पर रख लोहे के हत्थेसे मिला कर एक मास तक आवृत घृतभाएड में छोड़ दे। . आलोडन कर पाक करना होगा। जब पाक शेप होने | इसका सेवन करनेसे विधि, अश्मरी, मेह, उसस्तम्म, पर हो, तब निम्नोक्त द्रव्य उसमें डाल दे। घे सब द्रष्य राठोला, भगन्दर आदि रोग जाते रहते हैं। ये है--विङ्ग सौंठ, धनिया, गुलञ्चरस, जीरा, पलाश. | चिड़म्य (सं० पु.) वि-डम्ब गए। विडम्बन, अनुकरण । वीज, मिर्ग, पीपल, गजपिप्पलो, निसाथ, त्रिफला, दन्तो विडम्यक (सं० वि०) विडम्बयति यि डम्व-णिच-ल्यु। मूल, इलायची, रेडीका मूल, पोपटका मूल, चितामूल, विडम्बनकारी, ठोड ठोक भनुकरण करनेवाला, पूरी माथा और वृद्धदारकपीज। इनमें से प्रत्येक २ नोला ४ पूरी नकल करनेवाला। २ अनुकरण कर चिढ़ाने या माशा और ८ रत्तो। माला रोगीक बलावट के अनुसार अपमान करनेवाला । ३ निन्दा या परिहाम करनेवाला। स्थिर करनी होगी। ४ प्रतारफ, धूर्त। .. Vol. XxI. 86.