पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४१४

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३४ विड़ास है। भारतमें पे फारसी विलियाँ उद्यानो पणिों . दक्षिणा के साथ यो धेनु दान करनी होगी। परिवार द्वारा भारत में लाई गई थीं। यास्तप चे गफगानि भी असमर्थ हो, तो ४ कार्यापण दान करनेसे पापसे मुक्त स्तानसे दो इस वेगमे माती हैं और "कावुलो विल्लो", हो जापेगा। स्रो, शूद. पालक और युद्ध के लिये ग के नामसे पुकारा जाती है। लेपटेनाएट रबिनका कहना । प्रायश्चित्त ही विधेय है । यिल्लियोफे पघसे जो पाता है, कि फारसमें पेसी विलियो होतो हा नहीं । भतरव इस होता है. यह उपपातकों में गिना गया है। "फारसी विल्ली" ग कद कायुली बिल्ली कहना ही उचित बहुतेरे पिवलोको पष्ठोदेयोको भानुचरी मानने है। . है। कायुदो इस जातिको विल्लियों को रोरं की पृद्धि । युट्रियों के मुंह से सुना जाता है, कि दिल्ली पाठांदेयोकी । करने के लिये उन्हे नित्य सायुनसे धोने सुखाते है। याहन है। उसको मारनेसे पुत्र आदि नद्रों होते और हमारे देशको बिल्लियां विशेष उपकारो हैं। ये लाम यदि पेट में चला जाय, तो यक्ष्माग पानांसोका। चूहको मार कर लेगादि नाना रोगोंसे देशयासियोंको रोग होनेको सम्भावना रहती है । अध्ययन के समय गुरु'. मुक्त करती है । मछली कोटे भो विलियोंसे येकार और शिष्यों के घोचसे विल्लो यदि पार हो जाये, तो उम . रहने नही पाते । फिर भी विल्लियों द्वारा उपद्रव भी समय दिन रात तक अध्ययन नहीं करना चाहिये। फा नहीं होता। रसोई घरको हटियां फोड़ कर उसमें । (मनु ४१२६) मनाटिके समय यदि बिल्ली मिट्टी फाइने रमे हुए मछली के टुकड़े ये या जाती हैं। वोंके लिये | दिखाई दे, तो शीघ्र हो गृष्टि दोगो, ऐसा समझना । रमा हुभा दूध गादि गोरस भी इनके मारे पचने नहीं चाहिये। पाता । इसीलिपे मनुष्यमात्र बिल्लियों पर नाराज रहता प्राम्य कृशकाय पिडालोंके चर्ग संघर्षणसे अधिक है। पनेरे यिल्ली देखने हो उन पर विना प्रहार विपे | तर गतिक-शक्ति विकीर्ण होती है। प्रसिद्ध काबुल नहीं मानते। फिर जो कयूतर पालने हैं, ये दिल्ली के एक | वेशीय पशमबहुल विल्लियोफे घर्ग ऐसा पधुतिक भी कयूमर के प्राण संहार पर उसे मार डालने की दी। तेज विशेष कम नहीं। अन्यान्य विल्लियोंके चर्गम फिक रहते हैं। हमने किसी किसोको इस देापके कारण! अपेक्षाशात फम तेज है। प्रयाद है, कि काली पिल्लियो- विलोमा दो टुकड़े कर डालते देखे हैं । हिन्दूशास्त्रों को हव हो यदि मनुष्यफे घरमें नीचे दयो हो, तो यह विल्लियों की हत्या करने को मनादी है। बिल्लीको हत्या | शल्यरूपमें गिनी जाती है। इससे उस मनुष्यफे घरमें करने पर महापातक होता है। यदि कोई दिल्ली मार कभी गड़ल नहीं होता, परं उत्तरोत्तर विपद मानेको हाले, तो उसको शुद्रदरगायत् माचरण करना पड़ेगा। सम्भावना रहती है। मारणफिया निमित्त बहुतेरे (मनु १९११३१) इस तरहको काली विक्टीको यो शव घरमै गाह मनुमे लिखा कि विरलोका जूठा भन्न पाना नहीं देते हैं। किन्तु इस शाभिचारिक फियासं दिसाकारका चाहिये बानेसे प्रास-सुवर्चला नामक फाय जल पान का दी अमङ्गल हुआ करता है । मायु दशारत्र में लिnt , करना होता है। कि विलीको विष्ठा जलानेसे फम्पयरमें विशेष उपकार बिल्लियों की हत्या नहीं करनी चाहिये। यदि होता है। का करे, तो उसे प्रायश्चित करना पडता है। इसके पहले का मासुका है, कि बिल्ली का चेहरा पापको प्रायश्चित्तकै विषयमें प्रायश्चित-वियेफर्म लिया है, कि सरद है। किन्तु भाकारमें ये छोरी होती है। सापा- तोग दिन दुग्ध पान या पादच्य करना चादिये। यह रणत: मस्तक और देदमाग ले कर सकी लम्बा १६ मशाम इत्या करनेका ६ सयाम् दैवात् पिल्ली मारनेका से १८ भार ८ १०१२ च तक होती है। वै. प्रायशिगत है। जान मुन कर बिल्लपों को मारनेसं बारह में पांच नगा रहने हैं। किमो हिमी विदोको गया , राशि एच्य प्रतका अनुष्ठान करना होगा। यदि इस संण्या याम मा देसी जाती है। विलियों के नifi for प्रायश्चित्त का मसमर्ग दे, तो उनको यथाशति रहता है। नसको सपा कम होने से यिपका बल मां बम .