पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४७

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. वाटी गृह आरम्भ करना चाहिये । इन सब महीनों में इन सब गृहमण्डगमें जब मिट्टी का घर बनाना हो, तब जिस स्थान दिशाओंकी नागशुद्धि रहती है। बाटोके प्रधान गृह- पर घर वनागा है, उस स्थानके ईशानकोणसे कारीगरको 'विषयमें इस तरह नागशुद्धि का निर्णय करना चाहिये। चारो कोनोंमें चार खूटे' गाड़ने चाहिए। किन्तु "सप्रधान गृहमें इस तरहको नागशुद्धि न देखने पर भी काम जिस स्थान पर ईटका मकान बनाना हो, वहां चल सकता है । इसमें किसी किसीका मत है, कि यदि अग्निकोण स्तम्भ खडा करना पड़ता है। इस प्रकार दिन उत्तम पाया जाय एवं चन्द्र तारादि शुद्ध रहें, तो स्तम्म धा मूत्र दोनों ही स्थानों पर यथाविधान पूनादि गृहारम्ममें मासका देाप नहीं लगता। करना आवश्यक है। सोम. युध, वृहस्पति और शनिवारको विशुद्धहाल- गृहस्थोंको मकानमै कबूतर, मयूर, शुक और सारिका में ( अर्थात् जिस समय गुरु शुक्रको वाल्यवृद्धास्तजनित पक्षा पोसना चाहिये । इन पक्षियोंसे गृहस्थों का मंगल फालशुद्धि न रहे ) शुक्लपक्षमे युतयामितादिधरहिन ! - होता है। दिनको उत्तरफाल्गुगो, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्रपद, भवनमएडपमें हाधीको हटो पचं घोड़े की हट्टीका रोहिणी, पुष्या, आर्द्रा, अनुराधा, हस्ता, चित्रा, स्वाति, रहना मंगलजनक है। किन्तु अन्यान्य जन्तुओंको हट्टी धनिष्ठा, शतभिषा, मूला, अश्विनी, रेवती, मृगशिरा तथा रहनेसे अमंगल होता है । वन्दर, मनुष्य, गाय, गधे, कुत्ते, श्रवणा नक्षत्र में बन, शूल, व्यतीपात, परिघ, गण्ड.. विल्लो, मेंड किंवा सूमर इन सब जन्तुओंकी हडियां अमं. अतिगण्ड और विष्कुम्भके अतिरिक्त शुभयोग, शुभतिथि गल-कारक होता है। तथा शुभ करणमें गृहकार्य आरम्म किया जा सकता है। शिविर वा वासस्थानके ईशानकोणमें पोछेको मीर विष्टि, भद्रा, चन्द्रदग्धा, मासदाधा प्रभृति, जो साधारण, अथया उत्तरकी ओर जल रहनेसे मंगल होता है, इनके कार्य में निषिद्ध हैं, उन्हें भी देखना होगा। तिथिके अलावे और किसी और जल रहनेसे अशुभ फल होता 'मम्बन्धमें एक विशेषता यह है कि पूर्णिमासे लेकर है। अभिशयक्ति गृह वा निकेतन-निर्माण करने के अष्टमी पर्यन्त पूर्व मुखका, नवमीसे लेकर चतुर्दशी समय उसको लम्बाई चौडाई समान न करें। 'पर्यान्त उत्तर-पूरवका, मावस्यासे ले कर. अष्टमी पर्दान्त गृहके चौकोन होनेसे गृहस्थोंके घनका नाश अयश्यम्मा- पश्चिम मुखका तथा नवमोसे ले कर शुक्ला न्तुर्दशी! यी है। गृहको लम्याई अधिक, चौड़ाई उसको अपेक्षा पर्यन्त दक्षिण मुका गृह मारम्भ नहीं करना चाहिये। कम होना ही उचित है। लम्बाई चौड़ाई कमा वेशी यह अत्यन्त निषिद्ध है। करनेफे समय मापके परिमाणमें जिससे मान्य न पड़े. - निनोक्त काठ द्वारा गृहद्वार तथा कपाट तैयार नहीं इसका ध्यान रखना चाहिये अर्थात् उनके मापके परि. करना चाहिये, करनेसे अशुभ होता है। क्षोरियशोद्भय 'माण दश, पीस तोस न हो। कारण इसमें यदि शून्य दारू, (अर्थात् जिस वृक्षसे लासा यां गांद निकलता हो)। पड़ेगा, तो गृहस्थोंके शुभ फलफे समय भी शून्य हो आ जिम पक्ष पर चिड़िया पास करती हो, जो वृक्ष मांधीसे उपस्थित होगा। . उम्बड़ कर गिर गया हो पा जिस वृक्षमें आग लग गई हो, . गृह या चहारदीवारोफे दग्याजेकी लम्बाई तीन हाय ऐसे पृक्षको काठ गृहम लगाना उचित नहीं 1,इसके एवं चौड़ाई कुछ कम गर्थात् दो होनेसे शुभ होता है। “मलामेहाची द्वारा भग्न, वनमान, चैत्य तथा देवालयोत्पन्न गृहके ठीक मध्यस्थलमें द्वार निर्माण करना उनित श्मशानजात, देवाधिष्ठित काप्ठ भी गृहकार्यमें वर्जनीय नहीं। थोड़ा न्यूनाधिक होनेसे हो मंगल होता है।' हैं। कदम, निम्य, घिमीतकी, प्लक्ष और शाल्मलीशके चौकोन शिपिर चन्द्रयेघ देनिस मंगलजनक । काष्ट भी गृहकर्ममें प्रयोग नहीं करना चाहिये। इन सब होता है। सूर्यवेध शियिर अमंगलकर है। शिविरक क्षों के अतिरिक साल या साखूश द्वारा गृहादिक कार्य मध्यमागमें तुलसीका पौधा रापना उचित है, सम्पन्न किये जा सकते हैं। . .. उससे धन, पुत्र और लक्ष्मी प्राप्त होती है, शिर्शायरफे