पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५२१

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विन्ध्यवासिंयोग-विन्ध्याचल ४३५ विन्ध्यवासियोग (सपु०) यमारोगको एक गौपध।। देवीको चक्रगताका दिखाई देती है। मन्दिरों किसी इसके धनानेकी तरकोव-सो'ठ, पीपल, मिर्ग, शतमूली, विशेष शिल्पचातुर्मका परिचप नहीं मिलता। यह एक आमलकी, हरीतकी, योजद, सफेद वोजवंद प्रत्येकका | चतुष्कोण गृह भी कहा जा सकता है। दो जगह देयोको दो चूर्ण पक तोला ले कर उसके साथ है तोला जारित । प्रतिमायें प्रतिष्ठित हैं । पर्वतके निम्नस्तरमें एफ मन्दिर, लोहा मिला कर जल द्वारा अच्छी तरह घोटे। पीछे देवीकी भोगमाया-प्रतिमा प्रतिष्ठित है और पर्वतके २ रत्ती भरकी गोली बनाये। इसका सेवन करनेसे अत्युचशिखर पर स्थापित देवीमन्दिरकी मूर्ति योगमाया- उरक्षित, कण्ठरोग, राजयक्ष्मा, वाहुस्तम्म भादि रोग | के नामसे प्रसिद्ध है। । प्रशमित होते हैं। ___स्टेशनसे उतर कर रेलपथसे जाते समय दक्षिण ओर विन्धयशुक्त (स. स्त्रो०) १ एक यवन राजाका नाम! | खेतोंमें एक सुन्दर शिय-मन्दिर दिखाई देना है। यह २ वाकाटक वंशीय एक राजाका नाम। (विष्णुपुराण)। चुनारफे पत्थरसे बना है। काशीश्यर महाराज इसके विन्ध्यसेन (स० पु०) राजभेद, यिम्बिसारका एक नाम।। प्रतिष्ठाता हैं । इस मन्दिरको छोड़ कर कुछ और मप्रसर विन्ध्यस्थ (सपु०) विन्ध्ये विन्ध्यपति तिष्ठतोति | होने पर मिर्जापुरका सदर रास्ता मिलता है । इस रास्ते. स्थाक। १ घ्याड़ी मुनिका एक नाम । (नि.) को पार कर लेने पर एक पहाड़ी तङ्ग रास्ता मिलता है। २ विन्ध्यपर्वतस्थितमान। .. इस तङ्ग रास्तेमें देवो भोगमायाका मन्दिर और मन्दिरसे विन्ध्या ( स० स्त्री० ) पुराणानुसार एक नदीका नाम || सटा याजार और घाट है। देवीका मदिर पर्वतगात्र (वामनपुराण) | पर ही एक समतल स्थानमें बना है। यह देखने में विन्ध्याचल-युक्तप्रदेशके पनारस विभागके मिर्जापुर | काशी मिर्जापुर आदि स्थानोंके सामान्य मदिरकी जिलेका एक प्राम और प्राचीन तोर्य । यह मिर्जापुर सदर- तरह ही है। इसमें शिल्पचातुर्या विशेष नहीं । से ७ मील दक्षिण-पश्चिम गङ्गानदीके किनारे अवस्थित | मंदिरके गर्भगृहमें देवीको मूर्ति नहीं रहती । मदिर- है। यह स्थान मिर्जापुर तहसील के कण्टित परगनेके | में दुकनेके पथमें अभ्यंतरस्थ एक पर्वतचूहाके गानके आन्दर है। सुप्रसिद्ध विन्ध्यगिरिका जो यश मिर्जाः ). एक ताके में देवीका दर्शन मिलता है। ब्राह्मणके सिया पुर जिलेमें मा पहुंचा है, उसी का नाम विधा अन्य यात्री देवीके सामने नहीं जा सकता। मन्यान्य • चल है। यह प्राम पर्वतगात्र पर अयस्थित है, इसीलिये. लोगोंको मदिर-प्राचीरफे एक दो फुटके झरोखेसे विधाचल के नामसे यह नाम भी परिचित है। । । देवीका दर्शन करना पड़ता है। अनः दर्शकों को तङ्ग ___ भारतवर्ष के सर्वजनपूजित विन्ध्येश्वरी या विन्ध्या झरोखेके कारण यही भोड़ हो जाती हैं। देवीको प्रतिमा पासिनोदेवोफे गुदामन्दिर इसी पर्वत पर अवस्थित रहने एक डेढ़ फटके पत्थर पर वोदो गई है और कागोकी से यह मनसाधारणके निकर बहुत परिचित है और बहुत अन्नपूर्णा और दुर्गादेयोकी तरह मुग्न आदि अवयव मय प्रसिद्ध है । पुराणों में विन्धयावल नगरीकी वर्णना है। सोनेके बनाये गये हैं। दुर्गामन्त्रसे देवीको पूजा और इमसे इस तीर्घाफे और देवीको प्रतिमाके प्राचीनत्यका अञ्जलि दी जाती है। इस भोगमायाफे मन्दिर में ही पूजा परिचय मिलता है। एक समय यह नगर प्राचीन पम्पा-पाठ और तीर्थ कृत्यका यड़ा आसपर दिखाई देता है। ' 'पुरकी राजधानी के अन्तर्गत था। विन्ध्यवासिनी देखो। । मन्दिरके सम्मुख लौहशलाहायेष्टित एक चयूतरे पर युग. पहले तीर्थयात्रियों को मिर्जापुरमें उतर कर देवी दर्शनके फाठ और होम स्थान है। ब्राहाण यहां चारों मोरसे 'लिग पैदल जाना होता था। यात्रियोंको सुविधा लिये-पैठ कर होम और चण्डोका पाठ किया करते हैं। सभी ईएपण्डिया' रेल कम्पनीने भव विन्धमाचल नामका एक | अपने अपने सामने एक एक होमकुएड बना कर हाम छोटासा स्टेशन बना दिया है। इस स्टेशनसे यह बहुत ही करते हैं। यहां भद होमकी ही अधिकता दिखाई निकट है अर्थात् स्टेशन पर खड़ा होनेसे विधायामिनी - देती है। धाग्य हाम भी प्रचलित है। चयूनरेके बीच