पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वाणचालना : इन सब देवाधिष्ठित वाणांका बहुत प्रयोग किया गया था| गारमें मिन्न भिन्न प्रकारके तार, तूपीर तथा धनुप थे। रावणका मृत्युवाण इस श्रेणीका अलंकारखरूप कहा इस समय दन्दुक और तोपेका विशेष प्रचार होने के कारण जा सकता है। दुष्मन्तादि राजगण वाण ले कर शिकार) वाण द्वारा शत् मोंके संहार करने की आवश्यकता बहुत कम करते थे(१)। सूर्यवंशप्रदीप महात्मा रघुने याण ले कर हो गई; किन्तु फिर भी ऐसा नहीं कह सकते, कि उस फारसवालों पर विजय प्राप्त करनेके अभिप्रायसे गमन | समय तोरन्दाज विल्कुल हो नहीं रहे । तव भी रणदुर्मद किया था। रामायण के अन्दर यसिष्ठ और विश्वामित्रके | राजपूतवो, भील एवं भोल-प्रभृति दुई असभ्य यद्ध में शक वाहिक आर यवन जातीय पोद्धा भी थें, जातियां तोरधनप द्वारा रणक्षेत्रमें शव ओंका नाश किया इसकी कया है। यह कहना व्यर्थ है. किवे उस समय करती थीं। युद्धमें धनुर्वाण भी व्यवहार करते थे। ___ अंग्रेजो अधिकारमें भी संथाल लोग तोर धनुप द्वारा महाभारतमें लिखा है, कि द्रोणाचार्यसे पांडवोंने युद्ध करते थे। उनकी पाण-शिक्षा मदभुत, लक्ष्य स्थिर याण चलानेकी शिक्षा पाई थी। एकलध्य प्राणाचार्यको / और सुनिश्चित पवं संहार अपरिहार्य था । सदर बनान्त. मूर्ति धना कर स्वोय मध्यवसायसे गुरुको शिक्षा अप- रालसे आततायोको लक्ष्य करके वे लोग जो वाण हरण करने लगा। पाणविधामें पारदर्शिता लाभ करनेके छोड़ते थे, उससे शव के मरने में कुछ भी संदेह नहीं रहता पाद वह गुरु द्राणको दक्षिणा देनेके लिये तैयार हुमा। था। इस समय इस विद्याका पूग हास हो जाने पर भी गुरुने उसको अद्भुत शिक्षा कौशल देख उसके दाहिने | "संपालोका काई" जनसाधारणके एदयमें धाणशिक्षाको बायको वृद्धांगुलि मांगी। घोर वालक एकलव्यने गुरुको पराकाष्ठा जगा देता है। मुंहमांगा दक्षिणा दे कर अपने महत्वकी रक्षा की। सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं, एक समय यूरोपोय ____महामारतीय इस विवरणको पढ़नेसे मालूम पाश्चात्य जगत्में भी इसका यथेष्ट व्यवहार था। प्राचीन होता है, कि उस समय राजपरिवार, साधरण नोक जाति तीर-धनुष ले कर युद्ध करतो थो। प्राचीन जनसमाज या समो क्षतियोंको पाण-शिक्षा प्राप्त करना | ययन लोग (Jonian) भी हाथमें धनुर्वाण धारण किये प्रधान कर्त्तव्य हो गया था। ताड़का-निधन कालमें श्री रणक्षेत्रमें दिखाई देते थे। ये लोग प्राचीन ग्रोस या रामचन्द्र के घाणसे मागेच राक्षसका लड्डा चला जाना, लिनिसवासियोंफो अन्यतम शाखा कहे जाते द्रौपदोके स्वयम्बर में चमरन्ध्र पथसे अर्जुन द्वारा मछली- थे। कार्येजिनीय योद्ध पृन्द, सुविख्यात रोमकगण, हण, का नेस मेदन, कुरुकुलपितामह महामति भोपका शर• गय और भाएठाल प्रभृति पर जातियां, यहां तक, कि शच्या निर्माण प्रभृति पौराणिक पाण्यानों में घाण चलाने सुशिक्षित प्रेज जातिके यादिपुरुप पंइंगलैएडके का चरम दृष्टान्त है। आदि नियासी घुटन लोग भी घाण घलाने विशेष । इसके बाद भी हिन्दू राजे तोर घनुप ले कर युद्ध करते पारदर्शी थे। उन देशीका इतिहास ही इसका साक्षी थे। सिकन्दरके भारताक्रमणके समय युद्धक्षेत्र में सहस्रों दे रहा है। तोरन्दाजोंको अवतारण देखी जाती है। माईनम्-अक. ___ पाश्चात्य जगत्को सुप्राचीन प्रोक और रोमन 'परोम लिखा है, कि मुगल सम्राट अपरशाहके अखा जातियोंके अभ्युत्थानके पहले असौरोय ( Assyrians ) पचं शक ( Scythians) जातियों के मध्य घोड़े जाते . (३) महाकवि कालिदास प्रतिके काव्यनाटफादिमें तीर | जानेवाले रथ पर चढ़ कर युद्ध करनेको रीति थी। इस धनुषके ध्यपहारका उरलेख देखा जाता है। उसके द्वारा मनु- समय भो यहाँके सुयात् मासादगातस्य प्रस्तरफलकादि. मान होता है, कि इन सब कवियों के समयमें राने महराजे स्वयं में धाणपूर्ण तुणोरस याद रवादिका चिन अहित देखा तीर धनुषं ले कर शिकार खेला करते ये एवं उनके सेना विभाग | जाता है। असोरीय जातिको पाण-विधाका पूर्णप्रभाव में यथेष्ट सीरन्दान से थी। उनकी कोलरूपा (Cuncilorm) पर्णमाला द्वारा उपलब्धि ____Vol xxI. 13. -