पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५६

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३० वाणनिव-वाणिज्य की जाती है। अनुमान होता है, कि उन लोगोंके प्राण वापरेमा (स.स्त्रो०) वह रेखा या क्षत जो: थाण थे, इसीलिये उन लोगोंने याणके अप्रकीलकका अनु. लगनेसे हो। . . . . . .. .. ..... . करण करके अपनी अक्षरमाला.तैयार को थो। .. याणलिङ्ग (सी० ) स्थावर शिवलिङ्गभेद । नर्मदाके प्राचीन मिन्नराज्य में भी तीरधनुपका अभाव नहीं किनारे ये सर. लिङ्ग पाये जाते हैं। निग्न शम्भ- देहणे । था । कालदीय, धादिलनीय, पार्थीय, शक, याहिक. वाणशाल (सं० लो०) याणागार, आयुधमाला! और प्राचीन फारसी जातिओंफे मध्यं वाणास्त्रका बहुत, वाणयर्पण ( स० लो०). याणदृष्टि, पष्टिके ममान वाण प्रचार या। सुतरां मनुमान होता है, कि अति प्राचीन गिरना! .. कालमें धनुष और वाण युद्धफे प्रधान अन गिने जाते थे चाणययार (सं० पु०) पफ प्रकारका जगरखा, लौह-वस्तर। पचं जगसाधारणको उसकी. विशेष यनसे शिक्षा दो / घाणसन्धान ( स० सी० ) लक्ष्य करके पाणयोझना। जाती थी। वाणसिद्धि (सं० स्रो०-) याणके सहारे लक्ष्य भेद करना । पाणजित् ( सं० पु०) विष्णु । घाणसूता (सं० स्त्री० ) उपा। ..: . :: . याणतण (मं० पु.) वाणाधार, तूपीर, तरकश !' वाणहन (सं०:३०) १ वाणारि।. २ विष्णु | ... . याणधा २० पु०) तूणीर, तरक : याणावली (सं० स्रो०) १ पाणोंको मायली, तीरोंकी कतार पाणानासा (सं० स्रो०) एक नदीका माम। २ श्लोकोका पञ्चक, एक साथ बने हुए पांच एलोक । याणनिरत (सं० लि.) वाणानसे भिन्न । 1. २ तीरों की लगातारा । - याणपञ्चानन (सं० पु० ) एक प्रसिद्ध कवि ।। पाणि ( सं० स्त्री० ) वण-णिच् इन् ( सर्वघागुम्याइन् । उप याणपथ ( सं० पु.) वाणगोचर। ४|११७) इति इन् । ययन, धोना । पर्याय-यति, प्युसि । घाणपाणि (सं० नि.) चाणास्त द्वारा मुसजित । .२ बाप दण्ड । । । वाणपात (सं० पु०) १ पाणनिक्षेप, घाण फेकमा पाणिज (सं० पु०) यणिज-प्यार्थ भण। षणिक, २ दूरत्यपरिमापक, यह जिससे दूरो निकालो जाय। पनिया। २ या याग्नि! . . . . . ......... पाणपातयतिन् । सं० त्रि०) गदर • गस्थित, पासमें पाणिजक (सं० पु०) वाणिग देखो। . .. पाणिजकविध (सं० वि०) धाणिमकानां विषयो. देशा रदनेवाला।

(भरिकमा कार्यादिम्या विधभक्तौ ।पा ४१२५४) इति

याणपुर (सं० स्रो० ) याण का मन और पुच्छभाग। -विधल् । यणिोंका स्थान, याणिज्यस्थान। पाणपुर ( म० को०) याणराजको राजधानी। पाणिजक (सं० पु.) पाणिज देखो। . .. याणगह ( पु.) एफ सुप्रसिद्ध कथि। वाणिज्य ( सं० 10 ) यणिजो मायः कर्म पायनिज घाणमय (सं० लि.) वाण द्वारा ममाच्छन्न। ध्यप्रविश्य-यत्ति, फाययिकपका कार्य पर्याय-मत्या. चाणमुक्ति (२० सी०) यांणन्युति, किसी यस्तु पर नून, वाणिज्य, पणिय पथ। (नटाधर) . निगाना करना। .. ज्योसिपमें लिखा है, कि: वाणिज्य या व्यापार. घाणाक्षण (सं०डी० ) वाणमुक्ति देशो! १ का आरम्ग किसी शुभ दिगको करना चाहिये। अशुभ पाणयोजन ( सं० लो०) १ तूणीर, तरकश । २ धनुषको दिनको वाणिज्य भारम्ग करने पर घाटा या नुकमान ज्या पाण लगा कर निशाना रना। होता है। भरणी, अरलेया , विगामा, फनिका, पूर्व याणप्ररथ (स .) गाश्रमाचारविशंश। । फल्गुनी मोर पूर्यापाढा , मादि नशाम. यात प्रेयना . पानस्य देशो। .टी किन्तु रोदना-टोक नहीं। रेयसी, अश्विनी, सापासी (सं० रनो०) पाराणमोका मानना . .चिवा नाममा प्रयणा और स्याति मादिनाया पाराम { से पु०). याणामुर। ... . . .! परोदना शुम और येचना गम है । ( ओरिगारण) : . परादना गुम