पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६६१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विवाह ५७५ अपने गांव का उल्लेख कर पतिको अभिवादन करेगी।। ॐ मा ग्दिन् परिणधिनो य आमोदन्ति दम्पती गोमिलके इस वाक्यको ध्याश कर भट्टनारायणने | सुगंभिर्दुगमतीतामप ट्राम्यरातयः।" (भूक १०१८.३२) लिखा है--सप्तपदीगमनके बाद नवोढ़ा पनी गुणविष्णुके भावानुसार इसका अनुराद इस पतिको जय अभिगदन करेगी, नव पतिके गोत्रका | तरह है- उल्लेख कर अभिवादन करेगी। पतिके अभिवादनसे । अर्थात् जो चोर डाकू आदि रात में पथिकों को लूटा सामवेदीय विवाहको परिममाप्ति होती है। पाटा या वटपारी किया करते हैं, ये इस दम्पतीको देन , वधूका पतिगृहमें प्रवेश । नसके। यह दम्पती मगलजनक पधर्म रथ हांक कर सामवेदीय विवाह पति, लिम्बा है- दुगंग पथको पार करे, शन, दूर हों। इसके पहलेकी "ततो दिनान्तरे रथारूढा वधू' कृत्वा वरः स्वगृह मयेत् ॥" | ऋक्का भी ऐसा हो अर्थ है। इन दो ऋक मन्त्री द्वारा विवाहके दिन के दूसरे दिन पति यधूको रथ पर | प्राचीन कालमें पथमे चोर डाकुओं द्वारा होनेवाले उप- चढ़ा कर अपने घर ले जाये। वों तथा पथकी कठिनाइयों का परिचय मिलता है। इसका मंत्र यह है- ऋग्वेदीय वियाह-पद्धति रथारोदणका जो मन्न ई, "ॐ प्रजापतिविखि टुपछन्दः कना देवता| यह इस तरह है- फलारोहणे विनियोगः। ॐ सुषिशुकं शाल्मलिं विश्व-"ओ पूपा त्येतो नपतु हस्तगृद्याचिन त्वा प्रावहता रयेन। रूप हिरण्यवर्ण सुवृतं सुचक्र । थारोह सूर्य अमृतस्य गृहान्गच्छ गृहपना यथासो वाशिनात्य विदयमा वदासि।" लोक स्पानं पत्ये कृणुष्व ।" (मृ १०८५२० ) (१० मएडल ८५ सूक्त २६ शक) सापर्ण भाष्यानुसार मका अर्थ यह है, कि 'हे। सूर्ये ( यहां कहो, कि हे वधू ), तुम्हारे पति के घर जाने ___ अर्थात् पूषा तुम्हारा हाथ पकड़ कर यहांसे ले जाये, अश्विद्वय रथ चला कर तुमको ले जाये', घरमें का रथ सुन्दर पलास तथा 'शाल्मलो ( साखू) वृक्षको | ज्ञा कर तम गृहिणो वनो । समाजकी उच्च घेणोके लकड़ियों का धना है। इसको मूर्ति बहुत उत्तम और सम्भ्रान्त लोगों में विवाह जो राति प्रचलित थो, पेदिक सुवर्णकी तरह प्रभाविशिष्ट और उत्तम रूपसे घिरी है।। मन्त्रमें उसोका आभास मिलता है। उसको स्त्री बहुन सुन्दरी है, यह दोनों का बासस्थान है। इस समय तुम पतिक घर उपयुक्त उपढ़ी न ले जाओ।। इसके बाद जो मन्त्र पढ़ कर वधूको घरमें प्रवेश कराना होता है, यह बहुत भारगर्भ है- ___ इस गाठसे मालूम होता है, कि यहुत पुगने समयसे ही इस देश में यका प्य रहार होता भा रहा है। "ओह प्रिय प्रजायेत समृध्ध तामस्मिन् गृहे गाहप वधु जिम रथ पर जातो थों, वह रथ मच्छी तरह ढका त्याय जागृहि । पना पत्या तन्वं सं सृजस्साधा विदयमा gi Sोता । यह था कि यदाय:"! (१० मपइन्न ८५ सूक्त २७ ऋक ) देख नहीं ले या पथको धूलि वधू पर न पड सक । पिता! इसका अर्थ यह है, कि इस स्थानमें तुम्हारे सन्तान के घरसे पति के घर जाते समय वधूको उपदोकन लेसन्तति पैदा हो और उनमें तुम्हारी प्रीति हो । इस जाने को प्रथा बहुत दिनकी है गर्थात् ऋत्येकालगृहमें रद्द कर तुम सावधानोसे गृहकार्यों का सम्पादन चलो भाती है। इस समय भी यह प्रभा दिखाई देती करो। पनि साथ अपनी देह और मनको मिला कर है। ऋग्वेदके दशय, मंडलके व सूक्तमें और भी मरणपर्यन्त गाई स्थर-धर्मका पालन करो। कितनी ऋमें चबूंक पतिगृइमें जाते समय रथ और नई बधु पो सुगृहिणा परिणत करनेके लिये विचार उपढीकन का उल्लेख है। के रिक मन्त्रों में इस तरह बहुतैरे उपदेश दिये गपे राहमें किसी तरह का विघ्न उपस्थित न होने के लिये हैं। दिन्दू पलो दासी नहीं है, यह फैयल पिलासको मी तिने हो मन्त्र दिखाई देते हैं। जैसे- सामग्री नहीं, पद है सहधामणी गौर सच्ची राहणो