पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६६५

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विवाह ५99 से गृह-शमशानमें लोटती है, उस समय भी उसी ब्रह्मा । गृहिणी और सहमियी। चर्यको व्यवस्था रह जाती है। मतपय हिदूविधाहमें स्त्री शास्त्रीय वचनों के प्रमाणोंसे प्रमाणित होता है, कि पुष्प संयोगको पक सामाजिक रीति नहों, इन्द्रियविलास हिंदुओंको विवाह-संस्कार गाई ध्याश्रमका धर्मसाधन. का सामाजिक विधिनिर्दिष्ट निर्दोष उपाय नहीं' अथवा | मूलक है। गाईस्थ्यधर्मके निमित्त स्रो-पुरुष एक सामाजिक वन्धन स्त्रीधर्म-निरूपणमें भी खिोके गाहस्थ्य के प्रति या Contract नहीं, यह एक कठोर यश और हिन्द दष्टि आकृष्ट करने के पहुतेरे प्रमाण दिये गये हैं। पति- जीवनका एकम पनिमें प्रगाढ़ प्रेम, पति के प्रति मऔर पतिकी गाईस्थ्य. .. मामाजिक जीवनके यह एक महानत समझ कर कार्यावली के प्रति पत्नी या तोयाना संपेग आदिके संसाराधसमें विवाह अवश्य कर्तव्य है। इसीसे शास्त्र निमित्त दहुनरे उपदेश शास्त्र में दिखाई देते हैं। काने एश वाफ्यसे इसका विधान किया है । मिताक्षा- ___माज कलके पश्विमीय लोगामें बहुतेका विश्वास के भाचाराध्याय, वियाहका, नित्पत्व स्वीकृत . हुआ | है, कि भारतीय लोग अपनी पत्नियों को दासी या लौंदी है । जोसे-"रतिपुत्रधर्मत्येन विवाहस्त्रिविधः तत समझते हैं। याज कल स्त्रियों के प्रति उच्चतर सम्मान समझते हैं। याज कल पुवाथों द्विविधा नित्या काम्यश्च ।" हिन्दुओंमें दिखाया नहीं जाता जो हिन्दूधर्मशास्त्रकि । अर्थात् रति, पुत्र और धर्म इन तोनों के लिये ही विवाह मर्मज्ञ हैं, ये जानते हैं, कि हिंदू शास्त्रकारोंने नारियों के होता है। उनमें पुनार्थ विवाह दो प्रकार है,-नित्य और | प्रति फैसा उच्चतर सम्मान दिखाया है, सिवा इसके काम्य । इसके द्वारा विवाहका नियत्व स्वीकृत हुआ. मनुसंहितामें स्पष्ट रूपसे स्त्रियों के प्रति सम्मान दिखाने. है। गृहस्थाश्रमोके लिये पुत्रार्थ विवाह नित्य है,। का उपदेश दिखाई देता है। मनु कहते हैं- उसे न करनेसे प्रत्ययाय होता है। अतएव ऋषिगण ____पुत्र प्रदान करती हैं, इससे ये महाभागा, पूजनीया सामाजिक हितसाधन और गाईस्थ्य धर्म प्रतिपालनके और गृहकी शोभास्वरूपा है। गृहस्थोंके घरमें गृहिणी लिये विधाइका अवश्य कर्तव्यताका विधान कर, गपे और गृहलक्ष्मीमें कुछ भी प्रभेद नहीं । ये अपत्या है। सब हिन्दू-शास्त्रों में विवाह के नित्यत्व प्रति. त्पादन करती हैं, उत्पन्न संतान का पालन करती है पादनके लिये बहुतेरे शास्त्रीय प्रमाण दिखाई देते हैं। । और नित्य लोकयात्राको निदानस्वरूप है। पेही गृह- ___"न रहेण गृहस्थ: स्याहाय्य या कथ्यते गृही। कार्यों को मूलाधार हैं। अपात्योत्पादन, धर्म कार्या, यत्र भार्या यह त भााहोन गृह पनम् ॥" शुश्रूषा, पवित्र रति, मात्मा और पितृगणफे स्वर्ग आदि . (वृहत्पराशरस हिना ४१७१) खाके अधीन है। ( मनु स्यो भध्याय) केवल गृहवाससे तो गृहस्थ नहीं होता, भार्याके साथ मनुने कहा है-कल्याणकामो गृहस्थ मारियोंको हर गृहमें वास करनेसे ही गृहस्थ होता है। जहां भार्या है, तरहसे बहुत सम्मान करे। (मनु १५६) वहां हो गृह, भााहीन गृह वन तुल्य है। ___पाश्चात्य समाजतस्वविद् कोमटी (Gomte) मादि (गृहत्पराशरसहिता ४७०) पंडित इसकी अपेक्षा त्रिोफे प्रति सम्मान दिखानेका कोई मस्पसमें लिखा । उत्तम उपदेश नहीं दे सके हैं। फलत: 'हिंदू गृहिणीको पटेल नही है And Time मार्यादोन व्यक्तिकी गति नदी है, उसकी सब क्रियाये साक्षात् गृहलक्ष्मी और धर्मका परम साधन समझ कर निष्फल हैं, उसे देवपूजा भोर महायशका अधिकार | आदर करने की शिक्षा दे गये हैं । पत्नो जिससे सु. महीं। एक पदिपेके रथ और एक पखवाले पक्षीको तरह, गृहिणी हो कर पतिव्रता बने, इसके लिपे वियाहक दिन भार्याहोन व्यकि सभी कार्यों में अयोग्य है। मार्यादीन - दो से मतोपदेश दिये जाते हैं। प्यक्तिको मुम्न नहीं मिलता और न उसका घर-द्वार "या दो ध्रु या पृथ्वी धूप विश्वमिदं जगत् । हो रहता है। अतएव हे देवेशि ! साश्वान्त होने। भुषा सपता इमे ध्र पात्रो पतिकुले श्यम् ॥" पर भी तुम विवाह करना।. ., . । (पिवार मन्य) Fol XXI, 145