पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६६८

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विवाह. 'हे प्राध्यमान देव ! जिस तरह यह ध्रुवलोक , महान् है। पहले जमानेमें भारतवर्षमें जो एकान्नवतिता चिरस्थायी है, यह पृथ्वी चिरस्थायिनी है, यह परिदृश्य- | प्रथा प्रचलित थी और उसका उस समय बड़ा आदर मान सारा चराचर चिरस्थायो है, ये अचलराजि भी होता था, यह पांचया मन्त्र उसीका प्रमाण है। सिया चिरस्थायी है-यह स्त्री भी पतिके घरमै उसी तरह इसके पांचवें मन्त्रमें जो गूढ़ गभीर' उद्देश्य है, जगत्कं ।, चिरस्थायिनी बने। गौर किसी देशमें वैसा भाव दिखाई नहीं देता। हिन्दु. . . "इह धृतिरिह स्पंधृतिरिह रतिरिह रमस्य । भोंका पाणिग्रहण आत्मसुखसम्मोगके लिये हो नहों, . मयि धृतिमंयि स्वधृतिर्मयि रमा मयि रमस्व ॥", वरं पारियारिक सुखसमृद्धिका उद्देश्यमूलक है। इस 'हे वधू ! इस 'घरमें तुम्हारी मति स्थिर हो। मन्त्रमें उसका ज्वलन्त प्रमाण मिलता है। इससे स्वामी , इस घरमै तुम सानन्द दिन वितामो। मुझमें तुम्हारो नवोढ़ा पत्नीको विवाहसंस्कारके समय अग्निदेव मादि मतिस्थिर हो, मात्मीयोंके साथं तुम्हारा मिलन हो । देवताओं के सामने प्रसन्ग गम्भीरनिनादसे कह देते थे-. मुझमें तुम्हारो भासक्ति हो, मेरे साधं तुम सानन्द दिन 'प्रियतमे ! तुमको केवल अपने सुख और सेवाके लिये .' विताओ। में प्रहण नहीं कर रहा है। तुम मेरे पिताको सेषा . प्रायः सभी स्मृति और पुराणादिमें स्त्रियोंके इसी करना, मेरी माता, पहन और भाइयोंको सेवा करना) गार्हस्थ्य और पातिव्रत्यधर्मपालनके लिये बहुतेरे हिन्दुविधाहफे जैसा उच्चतर लक्ष्य और किसी समाजमें : उपदेश दिये गये हैं। ये सभी उपदेश घेदमें विवाह दिखाई नहीं देता। यों तो हिन्दुओं के प्रत्येक कार्यौ । समयमें पोंके प्रति जो सब उपदेश दिये गये है, वार्थविसर्जनका पवित्रचित देदीप्यमान रहता है। उन्हे उपदेशोंके आधार पर वादके स्मृतिकारने स्त्री.. किन्तु विवाहका यह पुण्यतम चित्र बहुत अधिक उज्ज्वल । धर्मका वर्णन किया है। पाणिग्रहणके मंत्र ऋग्वेदके दिखाई देता है। समयसे चले आते हैं। उसी पुराने समयमें भी इस छठा मन्त्र पतिपत्नीके एकाप्रचित होनेका महा- देशका पाणिग्रहण कार्य कैसा उत्तम था, उसका | मन्त्र है। जव विधाताके पिधानमें दो भिन्न भिन्न प्रमाण इन मंत्रोंसे मिलता है । पाणिप्रणफे पहले मंत्रमें हदय एक सूत्र में बंधता है, तय इसके तुल्य और क्या . जो स्त्रियोंको यह उपदेश दिया जाता था जिससे उनकी . हो सकता-'मेरा जीवनवत तम्हारा जीयनप्रत वने, : गार्हस्थ्यधर्म अच्छी तरहसे प्रतिपालित और पाणिग्रहण | तुम्हारा वित्त मेरे चित्तका अनुयायो हो, तुम अनन्यमना करनेवाले व्यक्तिक ससारको सुखसौभाग्य बढाये। हो कर मेरे वाफ्यों का प्रतिपालन करो। विश्वदेवगण . दूसरे मंत्रमें यह उपदेश दिया गया है, जिससे पतिक हम दोनों के हृदयको मिला दे। वायु, धाता और वाग्देवी घर जा कर स्त्री अपने क्रोधकी जलाअलि दे दे. हम लोगों को जोड़ दे।' इत्यादि । केवल यही नहीं, जिस कोधष्टिसे पतिके प्रति या पतिक. आत्मीय इसके लिये एक और सुमन्त है। . . . . . स्वजनोंके प्रति न देखें, घे पतिको प्रतिकूलचारिणो न "अन्नपाशेन मणिना प्राणसूत्रेण पृश्निना। . बने, जिससे घे पतिके पशु आदिको मङ्गलकारिणो वने, बध्नामि सत्याग्थिना मनश्च दृश्यञ्च ते ॥" .. जिससे गौ भैस आदिको सेवापरिचर्या में उनका लक्ष अर्थात् 'हे यधू ! तुम्हारा मन और हृदय अन्नदान रूप . हो, क्योंकि ये सब पशु गृहस्थ घरके सौभाग्यवर्ट क मणितुल्य पाशमें तथा.. प्राणरूप रत्नसून में और सत्य के कारणस्वरूप मरने जाते थे अर्थात् भर्ताद आत्मीय स्वरूप गांठसे में बांधता हू; हिन्दूरति विवाहक पवित्र स्वजन और पशुओं के प्रांत नवोढाका वास्तविक 'प्रेम होमानलको साक्षी रख, देवता ब्राह्मणको साक्षी रख बना रहे। तीसरे मन्त्रमें दूसरे मन्त्रको आंशिक पुनरुक्ति अपनी सहधर्मिणी पत्नोसे कहता है- ही दिखाई देती है। चौथा मन गर्भाधानक विषयमे है।.... "यदेतद्धृदय तब तदस्तु हृदयं मम । यह सन्तान फामनामूलक है। पांचवें मन्त्रका उद्देश्य यदिद हृदयं मम तदस्तु हृदयं तय ॥" .-