पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६७१

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विवाह-विधि विवाहमें शुमाशुभ दिन-विवाहमें ज्योतिपोक शुम कन्याके जन्म मासमें विवाह प्रशस्त है। कन्या दिन देख उसो दिनको विवाह निर्दिष्ट करना चाहिये।। जन्म मासमें विवाह होनेसे वह पुत्रवतो, जन्ममाससे यशुम दिनको विवाह नहीं करना चाहिये। दूसरे मासमें विवाह करनेसे धनसमृदिशालिनी तथा . वियाहात मास-मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन, वैशाख, जन्म नक्षत्र में और जन्मराशिमें विवाह करनेसे सन्तति. ज्येष्ठ, इन्हीं कई महोने में विवाह करना चाहिये। सिया | युक्त होती है। इनके अन्य महीने में विवाद होने पर वह कन्या धनधाना पुरपके लिये जन्म मासमें विवाह निषिद्ध है। किन्तु और भाग्यरहिता होती है। धावण महीने में विवाह इसमें प्रतिप्रसव इस तरह है-र्गके मतसे जन्म मास- होनेसे कननाये सन्तानहीना, भाद्रमासमें वेश्या, कार्तिक फं पहले साठ दिन छोड़ कर विवाह किया जा सकता में रोगिणी, पोपमासमें विधवा और वन्धुवियुक्ता तथा है। यवनके मतसे दश दिन और वशिष्ठके मतसे केवल चैत्रमासमें विवाह करनेसे मदनारमादिनी होती है । इनके | जम्मका दिन वाद दे कर दालकका विवाह किया जा मिया अन्य महीने में विवाह करनेसे कनवाये पुत्रस्तो सकता है। और समृद्धशालिनो होती है। विवाहके उपयुक्त वार-बृहस्पति, शुक्र, बुध और जिन निषिद्ध मासके सम्यन्धमें अभी कहा गया, सोमवार विवाह के लिये उपयुक्त दिन हैं। इन सय शुम उनके प्रति प्रसप ऐसा दिखाई देता है। जैसे--किसी | दिनमें विवाह करनेसे कन्या सीमाग्यवती होती है और दूसरे देशके राजा द्वारा अपना देश आक्रान्त होने पर | रवि, शनि और मङ्गलवारको विवाह करनेसे कन्या , अपया देशमें युद्ध उपस्थित होने पर या पिता माताके | कुलटा होती है। अरक्षणी कन्या लिपे रवि, शनि और प्राण संशयमें पडनेसे कन्याके विवाह के समयसे अधिक मङ्गलवारको भी विवाद करना दोषायह नहीं। क्योंकि समय बीत जाने से विवाह विहित मास आदिको प्रतीक्षा विवाह रातको होता है। अतपय बियाहमें धारदोष नहीं करनी चाहिये । कन्याकी उम्र यदि इस तरहसे बढ़ नहीं होता। किन्तु जय कन्या आरक्षणीया नहीं हो, तब गई हो जिससे कुल और धर्मके थनिष्ट होने की सम्भा. तो पारदोषका विचार करना ही होगा। पना हो, ऐसी अवस्थामें केवल चन्द्र और लग्नका वल विवाहतिथिनिपिद्ध-~-अमावस्या मौर चतयों, देख कर निषिद्ध काल आदिमें भी कग्यांका विवाह कर दिया जा सकता है। नवमी और चतुर्दशी तिथि और विधिकरणमै विवाद - फन्याय जन्मसे दश वर्षसे पहले ही प्रहोंकी शुद्धि, विशेषरूपसे निषिद्ध है। किंतु शनिधारको यदि चत थीं, ताराशुद्धि, वर्णशुद्धि गर्धात् युग्मायुग्मका विचार, मास. नयमो और चत शो हो, तो यह विवाह विशेषरूपसे 'शुद्धि, आपाढ़ आदि निषिद्ध मासेका परित्याग, भयन । प्रशस्त है। इसके सिवा अन्य तिथियों प्रशस्त हैं। शुद्धि, दक्षिणायन परित्याग, ऋतशुद्धि, शरत् भादिलो किन्त, चंद्रदग्घा, मासदग्धा आदि सय तिथियों में अनुरोका परिहार, दिनशद्धि, शनि और मंगलयार! सभी काम घर्जित हैं। नएय विवाह मा निपिद्ध पर्शन, इत्यादि विषपोंका मवलोकन नहीं किया जाता। समझना। पाप और चैत्र इन दो मासाको सिया अन्य दश मसिमें विवाहमें निषिद्ध योग-प्यतीपातयोगमै घियाह "( यदि कोई मास मलमास हो, तो उस मासमें विवाह होने पर कुलोच्छेद, परिघयोगमे स्वामि-नाश, धृति- नहीं किया जा सकता) विवाह किया जा सकता है। योगमें विघया, अतिगएडमें विषदाह, ध्याघातयोगमें यही शास्त्रका अभिप्राय है। ज्येष्ठ पत्र और न्यायाधि, इर्षणयोगमें शोक, शूलयोगमे प्रणशल, गएडमें • सम्बन्ध में एक विशेषता है. अप्रहायणमासमें ज्येप्रका रोगमय, विकुम्ममें सर्पदंशन और यजयोग मरण होता विवाह किसी तरह नहीं होता किन्त जो सुतरा पियाहम पेश योग विशेष यजित है। सम्बन्धमें कहा गया कि मासका प्रथम शदिन छोड़ विवाहमें विहित शुभ नक्षत्र-रेवतो, उत्तरफल्गुनी, कर विवाद हो सकता है। याद दा सकता है।, ..... . उत्तराषाढ़ा, उत्तर-भाद्रपद, रोहिणी, मृगशिरा, मूला, Vol. XXI. 146