पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७०६

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६१८ विश्वगाव-विश्वज्योतिस् विश्वगाव (सं० लि. ) विश्वगोत्रसम्बन्धीय। विश्वजनीन (स.नि.) विश्वजनाय हितं ( यात्मन् विश्व (शतपथब्रा० ३।५।३१५) । जनभोगोत्तरपदात् खः । पा ५।१६) इति-स्ख । विश्वजनका विश्वगात य (सं. नि०) १ विश्वगावसंश्लिए । | हितकर, सभी लोगोंका हितजनक । । २ वाधयुक्त। (भथर्व ५२१॥३) विश्वजनीय ( स० त्रि०) विश्वजनका हितकर, समी , विश्वगाता-विश्वगोप्त देखो। । लोगोंकी भलाई करनेवाला। विश्वगाप्त (२० पु० ) विश्वस्य गोप्ता रक्षयिता। १ विश्वजन्मन् (स' नि०) विश्वस्मिन जन्म यस्य । १ विश्व विष्णु। २ इन्द्र । (त्रि०) ३ विश्वपालक, समस्त जात। २ विभिन्न प्रकार । विश्यका पालन करनेवाला । विश्वजन्य ( स० वि०) विश्वजनाय हितं हितार्थे यत् । . विश्वन्धि (स स्त्रो०) १ हंसपदी लता। २ रक्त- विश्वजनका हितजनक, सोंकी भलाई करनेवाला। , लजालुका, लाल लमालू। विश्वजयिन् ( स० त्रि०) विश्त जयति जि-णिनि । विश्व. विश्वग्यात (स'. पु० ) विश्वग्वायु देखो। । जेता, विश्वको जीतनेवाला .. ' विश्वग्यायु ( स० पु०) विश्वगगतो वायुः। सघता- | विश्वजा ( स. खो०) शुण्ठि, सोंठ 1. गामी वायु, वह वायु जो सब जगह समानरूपसे चलती | विश्वजिछिल्प (स.पु. ) एकाहभेद। है।। यह वायु अनायुष्य ( आयुष्कर नहीं' ) देोषः । (पञ्चविशमा०.१६॥१५॥१) वर्द्धक और नाना प्रकारका उत्पात उत्पन्न करनेवाली | विश्वजित् ( स० पु.) विश्वं जयति जि-त्रिप, तुक च । मानी जाती है। सभी ऋतु में यह वायु बह सकती १ यक्षमेद, सर्वस्वदक्षिण यह। इस यइमे कुल धन , । दक्षिणामें दे देना होता है। २' न्यायविशेष । यह . विश्व ( स० वि०) विश्वमञ्चति पञ्च-क्षिप् । सर्वत्र-। न्याय इस प्रकार है-विश्वजित् के द्वारा यज्ञ करें' अर्थात् गामो, सब जगह जानेवाला। विश्वजित् यश कर' जहां फलकी किसी प्रकार श्रुति विश्वङ्का (संपु०) विश्व सर्व करतोति प्रकाशय. अभिहित न होनेसे नित्यत्व कल्पित हुमा है तथा फला- . सोति फवाहुलकात्र, द्वितीयाया मलुक । चक्ष, नेत्र।। भिधान न रहने से भी पीछे यज्ञफल खर्गादि कल्पित विश्वचक (स. क्लो०) विश्वतः सर्वत्र चक्र यस्य ।। होता है, यहां यह न्याय होगा, विश्वजित् यम करे, इस . महादानविशेष, पारद प्रकारफे महादानमिसे एक प्रकार उक्तिमें स्वर्गादिके सम्बन्ध कोई बात न रहने पर भी । का महादान | इसमें एक हजार पलका सानेका एक यशानुष्ठानफे बाद यशफल स्वगं मापे आप होता है, इस एक चक्र या पहिया वनवाया जाता है जिसमें सोलह कारण यह न्याय हुआ। भारे होते हैं और तथ यह चक कुछ विशिष्ट विधानोंके ३ वरुणका पाश । ४ अग्निविशेषः। (भारत ३२११८१६) अनुसार दान किया जाता है। ५ दानवविशेष। ( भारत १२२२२७५१) ६ सत्य. - विश्व कारमा (स. पु०) विश्वचक्र ब्रह्माण्डमेव मात्मा | जितके पुत्र । ( ३२२०१६) ७ विश्वजयी, विश्वजेता। . स्वरूपं यस्य । विष्णु, नारायण । (मत्स्यपु० २३६ अ०), ८ सह्याद्विवर्णित राजभेद । ( सा. ३३१४६) . विश्वक्षण () विश्वचक्षस् देखा। वह जिसने सारे विश्व पर विजय प्राप्त का हो। विश्ववक्षस् ( स० वि०) सर्वविश्वके प्रकाशक, जो विश्वजिन्य (स.नि.) १ सर्वगामी, सर्पजेता। समस्त जगत्को प्रकाश करते हैं। | विश्व जीव (सं.वि.) १ सर्वान्तर्यामी । २ विश्वस्थित विश्ववनस् (स० वि०) सर्वदों, ईश्वर। जीवमात्र। विश्वणि (सत्रि०) सर्वमनुष्ययुक्त, सभी यजमानोंसे विश्यजू (स' त्रि०) विश्व के प्रेयिता। (ऋक ४।३३।८) पूज्य । (अक १६६३) विश्वज्योतिष (स पु०) गोत्र प्रवर्तक ऋपिमेद । विश्वजन (स० पु०) सर्वजन, सभी मनुष्य। विश्वज्योतिस् (स० वि० ) १ जगज्ज्योतिः। २ पकाह.