पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७२६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


. . . . विश्वामिन ६३८ विश्वामित्र या तवंशीय ऋषिगण । 'उक्त मण्डलोंको। कहते हैं, "हे विश्वामित्र और जमदग्नि | तुम लोगों के विशेष रूपसे पर्यावेक्षण करनेसे मालूम होता है, कि वे | सोम प्रस्तुत करने पर जब मैं तुम लोगोंके घर जाऊंगा इपीरखफे अपत्य कुशिकय शोय ( ३।१) थे । राजा तब तुम लोग मेरो खूब स्तुति करना।" उक्त दो कोंसे . कुशिक कुशके अपत्य और उन्ही राजा कुशिकके तनय | स्पष्ट समझा जाता है, कि विश्वामित्र और जमदग्नि : गाथे ( गाधि) पि थे। (ऋक् २०१९-२२ सूक्त) .आपसमें नैकट्य सम्बन्धसूत्र में आवद्ध थे। . . महाराज गाधि पुरुवंशाय और कान्यकुब्जयो नरपति कहे ___ अपवेद ४।२६।५ और १८।३।१५ मन्त्रों में प्रापनि । गये हैं। इसी कारणसे हरिवंश आदि विभिन्न पुराणा विश्वामित्रको रक्षाके लिये स्तुति की है। इससे उन- ख्यानों में विश्वामित्र पौरव, कौशिक, गाधिज और गाधि को पियोंके भी स्तयनीय कहा गया है। ऐतरेय . गन्दन आदि नामसे अभिहित किये जाते हैं। ब्राहाण ६१८ और ६२० मन्त्रों में विश्वके मिन विश्वा । ऋक्स हिताके ३३५३ सूत्रमें सुदास राजाफे यशकी | मिल-दूष्ट सूकोंके वामदेव ऋषि द्वारा पढ़ने की बात है।' घात है। यहां विश्वामित्र महान् और ऋषि है, ये देव शतपथब्राह्मण १४।५।६, तैत्तिरायसहिता ३१७१३ और जार गौर देवजूत तथा नेतृगणफे उपदेशक हैं। ये जल ५।२।३।४, पंचविशवा० १४।३।१२, शख्यिायनधौतमृत विशिष्ट सिन्धुके वेग अर्थात् विपाट और शतद्र नदीके १५२१११, माश्वलायन गृह्यसूत्र ३४२ आदि चैदिक- ' संयोगस्थलको रोकने में समर्थ हुए थे । (प्रक अन्धों में विश्वामिनका विवरण प्रकरित है।. . . '. २३३॥ माय ) उन्होंने जब सुदास राजाके यछमें पौरो. , विश्वामित्रके जम्मके सम्बन्ध में वर्णित है, कि महा- हित्य किया था, तब इन्द्रने कुशिकवंशियोंके साथ प्रिय राज गाधिके सत्यवती नामकी एक कन्या थी। गाधिने ध्यवहार किया था। (३५३।६ ) भोजनों तथा विरूप भृगुघशीप ऋचीक नामक एक पृद्ध ऋषिके साथ उस अहिराको अपेक्षा असुर आकाशके घीर पुत्रोंने विश्वा | | कन्याका विवाद कर दिया | इस क्षतिया पनोके मित्रको सहन सुयशने (अश्वमेधर्म ) धन दे कर उनका गर्भसे ग्रामण्यगुणशालो पुत्रप्राप्तिको पासनासे चीक- जीवन द्धित किया। (३१५३१७) कहा गया है, कि ने उसके लिये एक चर तप्यार कर सत्यवतीको स्वानेको सुदास यक्षमें घसिष्ठके पुत्र शक्तिने 'विश्य मिनफे पल | दिया। इस चरके साथ क्षत्रिय गुणशाली.पुत्र गम गौर वाक्य हरण कर लिये। जमदग्निगणने सूर्यादुहिता धारण करने के लिये उन्होंने अपनी पत्नीकी माताको भा' वाग्देवताको धुला कर विश्यामित्रको प्रदान किया। ऐसा ही और एक पात्र चय प्रदान किया। -माताकी . सुदास राजाका या समाप्त कर जव विश्वामित्र घरकी | प्ररोचनासे वाध्य होकर सत्यवतीने माताके चरुसे । लौटे तक उन्होंने सय रथाङ्गोंको स्तय किया था। अपना चरु बदल कर भक्षण किया और उसके अनुसार ___सिया इसके उक्त सहितामे १०।१६७४ मन्त्रमें माता ब्रह्मण्यगुणप्रधान विश्वामित्रको और कन्या जम.. विश्वामित्र और जमदग्नि द्वारा इन्द्रकी स्तुति करनेका | दग्निको गर्भ धारण किया। इस जमदग्निफे औरससे भी उल्लेख है। वहां इन्द्र दोनों पियोंका सम्योधन कर | समय आने पर क्षत्रगुणप्रधान परशुरामका जन्म हुआ। . परशराम देखो।

  • मूलमें "इमे भोजाः नापिरसः विरूपाः दिव पुत्रास: बसु महाभारतमें अनुशासनपर्णके चौथे अध्यायमें जो

रस्य धीराः।" यह सब पाठ है। सायपने भोजाः अर्णमें | विश्वामित्रकी उत्पत्ति होनेका थियरणा :लिखा है, उसके 'सौदासाः क्षत्रिया' किया है। साथ हरिवंशका वर्णन बहुत मिलता जुलता है। " शूक् ३१५३।१५ मन्त्रमें विश्वामित्रके मागदेवता प्राप्तिको .. हरिवंशमें लिखा है, कि महाराज कुशफे कुशिक और बात लिखी है। इसके साथ हरिश्चन्द्रापाख्यानोक्त विश्वामित्रकी | कुशनाम आदि, चार पुत्र हुए । कुशिकने इन्द्रसदृश विद्यासाधनाका सम्बन्ध है क्या ? . . . . . पुत्रको कामनासे हजार वर्ष:कठोर तपस्या की। : इन्द्र- ' भृक ३३५३१७ | ने इस तपस्यासे.सन्तुष्ट हो कर मशरूपसे कुशिकपनो