पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७५५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विष ६६३ . २०। रा-मारतवर्षक जडलोमें यह उद्भिद देखा। ब्राह्मण २११ आदि स्थानों में विषको नामफत्व जाता है। इसका भारतीय नाम सुना नहीं जाता 11 शक्तिका उल्लेख है। भगवान् मनुने लिखा है,कि इससे जयपालको तरह दम्त भौर के होती है। ! स्थावर जङ्गम नामक कृत्रिम या अकृत्रिम गरादि विष २१ । पारासिषय-इसकी विपक्रिया स्नायधीय यन्त्र! कभा भी जलमें न फेकना चाहिये । ( मनु ४५६) विष पर प्रतिफलित हो मोह आदि उत्पन्न करती है। बेचनेका मनाही है। जो विष येवता है, वह पतित २२ 1 पारायन जायन्धया रतन जोन-इसके बीजसे । और निरयगामा होता है। (मनु १०1८८) हैजेको तरह दस्त भौर के होतो है। विषकङ्कालिका ( स० स्रो०) पृशविशेष, विषककोल। · हिन्दू शास्त्र (ऐतरेयत्राह्मणमें ) विषको उत्पत्तिके विषकङ्कोलिका (सं० स्रो०) विपकंकाल । सम्बन्धमें लिखा है, कि भगवन्नारायणने कूर्मायतारमें | विषकएट ( सं० पु. ) इङ्गदो वृक्ष। ( राजनो०) पीठ पर मन्दरपर्वत धारण कर धरतीका मडल साधन विषकण्टक (सं० पु. ) दुरालभा, जावा, धमासा । किया था। देवों और भसुरोंने दो दलों में विभक्त हो । विपकण्टका (सं० खो०) पन्ध्याकर्कोटका, पांझ फकड़ी। उक पतिको मन्धनदण्ड और वासुको (नाग) को पर्याय बन्ध्याकर्कोटका, देवा, कन्या, योगेश्वरी, रस्सो धना कर समुद्रका मन्थन किया था। इसके फल- नागारि, नागदमनी । गुण-लघु, प्रणशोधक, तीक्ष्ण तथा से सशिपमें विष उतरन्न हुआ। निताप हर महादेव कफ, सर्पदर्ण, विसर्ग और विपनाशक। (भागप्रकाश ) 'उम गरलका पान कर हो नीलकण्ठ हुए हैं। विषकएटालिका (सं० स्त्रो०) एक प्रसिद्ध वृक्ष । समुद्रमन्थन और इलाहल शरद दखो। । विषकण्ठ (सपु.) नालकण्ठ, शिय । ऋग्वेदोय युगी भाय्यं पेगण सर्पविष और विपकण्ठिका (सं० खा० ) वकपक्षा, वगला । अन्यान्य विषोंका जानते थे और उन्हे इनका व्यवहार विषकन्द ( स० पु० ) १ मदिपकंद, भंसा कन्द । २ नोल- भी मालूम था। उक्त संहिताके ७५० सूकके पढ़नेसे करठ। ३गुदोरक्ष, हिंगोट । मालूम होता है कि पसिष्ठ पि मिसायरुण, अग्नि, विषकन्या (सं० स्त्रो० ) वह कन्या.या स्त्रो जिसके शरार- और वैश्वानरकी स्तुति करते समय कहते हैं-"कुलाय. में इस माशयसे कुछ विष प्रविष्ट कर दिये गपे हों, कि कारी और सर्वदा यद्धमान, विप हमारे सामने न आये। जा उसके साथ संभोग करे, वह मर जाय । आजका नामक रोगविशिष्ट दुई न विप विनष्ट हो। प्राचीन काल में राजाओंके यहां यचपनसे हो कुछ छद्मगामी सर्प शब्द द्वारा हमका न जान सके। जो यन्दन नामक विष नाना जन्ममै वृक्षादिके ऊपर मृत कन्यायोंके शरीरमें अनेक प्रकारसे विप प्रविष्ट करा दिया जाते थे। इस विषके कारण उनके शरीरमें ऐसा भाष होता है, वह विष पुटना और गुल्फ स्फीत करता है। मां जाता था कि जो उसके साथ विषय करता था, यह दीप्तिमान अग्निदेय यद्द विष दूरोभूत करें। मर जाता था। जय राजाको अपने किसो शन्नको गुप्त . . (भूक् ७५०१.३): रूपसे मारना अभीष्ट होता था, तब वह इस प्रकारको १६१२७११६.१९१८७११८ और २३ मन्त्रको पढ़नेसे मालूम होता है, कि ये सब विष दाहकारक और प्राण- विषकन्या उसके पास भेज देता था। जिसके साथ . नाशक होता है। शंभोग फरफ वह शतु मर जाता था। ... अधवेदक धार मन्त्रों में कन्दमूलादि विपकी मुद्राराक्षस ( ४२१६ ) और कथासरित्सागर प्रवरसाका उल्लेख है। पार१० और RR (१६८१)-में विषपान द्वारा तैयारको गई सुन्दर ललना. मन्वोंके पढ़नेसे मालूम होता है, कि यह मनुष्यों के का उल्लेख मिलता है। यह कन्या प्रति दिन थोड़ा चिप लिये विशेष सपकारक है! शतपथम्रा० राधा१२, शार खिला कर पाठो गई घो। जो व्यक्ति उस कन्या साथ ६।१।११०, पञ्चशिग्राह्मण और तैत्तिरीय। मंभोग करता उसको मृत्यु अयश्यम्भागी थी। मन्त्री