पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२३९

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कास्यादिपोतमें धमा पौर मुमा लुसे धूप, तथा सावर्ती दोपहारा धूप बनतो है। जितने द्रव्य के भक्षण करनेसे एक पुरुषका पेट भरता है, उतनेसे नवेद्य बनता है। (इस न वेद्य नानाप्रकारक पदार्थ मिलाये जाते, खाद्य वस ४ प्रकारमे कम न होनी चाहिये)। कार्या. सादि सूतकें हारा ४ अङ्गल परिमित ७ वति बना कर उसमें कपर संयुक्त कर जला देनेसे दीप और ७ बार प्रदक्षिणा कारक प्रणाम करनेमे उसको बन्दमा ममझना चारिय। (विष्णुप्रीति के लिए ताम्रादि पात्र में या कार्य करना चाहिये। टूर्वाक्षत कहनेसे एकमोसे अधिक दूर्वा और प्रक्षत लेना चाहिये। धनशाली व्यक्ति के लिए यही उत्तम विधि है। इस विधि के अनुसार जो पूजा करता है, वह समस्त भोगोंको भोग कर आखिर हरिपुरको गमन करता है। विभवहीन व्यक्ति यथाशक्ति उपचार द्वारा जा कर मकता है। यह अनुकल्प धनवानों के लिए नहीं है। धनवान व्यक्तिके ऐसा करने पर वह निष्फल होता है। मन्त्रसत-अर्थात् बीज । जैसे भवनखगे बोज । "नकुलीशोऽग्निमारूढो वामनेत्रा चन्दवान् ॥" नकुन्नीश शब्दमे 'ह', अग्नि शब्दसे 'र', वामनव शब्दसे 'ई' और अर्थचन्द्र शब्दसे " इन सबसे "हो" मन्त्रका उद्धार हुपा। कालोबोज, यथा- 'वर्ग दिसंयुक्त रतिबिन्दुसमन्वितम्।" वर्गाद्य शब्दसे 'क', वहि शब्दमे 'र' रति शब्दमे ।' और बिन्दु शब्दसे "'-उनसे "कों' इम मन्नका उतार हुआ। इस माइतिक पदसमुहको मन्त्रसत कहते है। वीज शब्दमें विस्तृत विवरण देखो। इस प्रकारसे किस तरहका चक्र होनसे उमको कौनमा यस कहते हैं, वह किस रीतिस बनाया जाता हैइन सब सतोके जाननको यन्त्रसस कहत है। बनशब्द देखो वीरांचार-पूजा । तम्बमें वीराचार-प जा एक प्रधान प्रण है। कलास-दीपिकाके सोय पटसमें लिखा है- "आदौ दीपनी देवेशि बकाया वीरपूभिते । . . बस्य विज्ञानमात्र जीवन्मुको मवेयर सर्वेषामेव देवानां दीपनीया प्रकीर्तिता। भनायतं विना विधा न सिष्यति कदाचन ॥ बिना पूजां बिना प्यानं विनाचार महेश्वरि । सापको शानमात्रेण भवेन्मुको महानपः। तत्कले नैव दारितद्गोत्र नास्स्यिपंडितः। प्राणं देयात् धन देयात् कुस' देयात् नियोऽपि च॥ एनां विषां महेशानि न दबात यस्य कस्यचित् । काली पोजत्रय कूर्चयुग तदनन्तरम् । बरनावीजयं देवि दक्षिणे कालिके तथा। पुनस्तान्येव वीजानि पहिकान्तावधिमनुः ॥ भैरवोऽस्य ऋषिः प्रोक उष्णिकछन्द उदाहतम्। दक्षिणा कालिका प्रोका देवता तन्त्रगोपिता ॥ बीजशक्ति देवेशि कूर्च लग्जा कमात् प्रिये ॥ अंगन्यासकरण्यासौ मायया परिकीर्तितौ । करालवदनां घो। मुक्तकेशी दिगम्बरीम। चतुर्भुजां महादेवी मुग्मालाविभूषिता । समात्यधिरः बगवामोषःकराम्बुमाम। अभयं वरदचैव दक्षिणाधोड़पाणिकाम् । महामेषप्रभा श्यामा बरककालकाविताम । कण्ठावशक्तमुकालीगण्टुधिरचर्चिताम् ॥ बोरद'ट्रा करालास्यां पीनोन्नतपयोधराम। शवरूप-महादेव-दयोरिसस्थिताम् । महाकालेन च समं विपरीतरतातुरा। एवं ध्यात्या प्रयोन मथैर्मीसैव भषितः । रक्तपुष्पै रकपदमै रक्ताम्बरसमन्वितैः । संपूज्य यनतो मन्त्री परिवारान् समर्पयेत् । पीठपूजां ततो देवि भाधारशक्तिपूर्वकम । प्रहति कमठश्चैव शेषं पृथ्वी तथैव च। सुधाम्नधि मणिद्रीपं चिन्तामणिगृहं तथा । श्मशान पारिजातच तन्मूळे मणिवेदिकाम् ॥ तस्योपरि मणे: पीयसेत सापकसत्तमः। चतुर्दिक्ष मुनीन् देवान शिवक्षनरमुण्डकान् । धर्माधर्मावाश्चैव ओ हो हानात्मने नमः। . केशरेषु च पूर्वादिष्विका बानाकिया तथा ॥ कामिनी कामदा और रतिः प्रीतिस्तव च । विया नामसानि मध्ये मन्नेमकी.