पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५१२

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५०० तिथि शेषको पकड़ कर उपवाम करना पड़ता किन्त ब्रह्म-। पक्षमौके दिन अध्ययम वा लिखना न चाहिये तथा उम ववत पुराणान्तगत गणेशव्रतमें हतोयायुक्त चतुर्थी | दिन सरस्वतीका उत्सव बरना चाहिये। इस तिधिम ग्राहा। बन्न न खाना चाहिये। मोमवारमै प्रमावमया, रविवार सप्तमो और मङ्गल- षष्ठो- सप्तमोयुक्त षष्ठो ही ग्रहण की जाती है। जेठ वारमै चतुर्थी पड़ने पर वे तिथियां प्रक्षया होती हैं मासको राकाषष्ठीको परण्यषष्ठी कहते है। इस कारण अर्थात् उन दिनों में गङ्गाखानादि करनेसे अक्षय तिथिका उत षष्ठोको स्त्रियां एक एक खा हाथमें ले कर वममें फल होता है। त्रयोदशी, चतुर्थी, सप्तमी पोर हादशी षष्ठोकी पूजा करने जाती है। इसको “जमाईषष्ठो” भो इन तिथियों में प्रोषमें अध्ययन न करना चाहिए। ईमा- करते हैं। ट्रिके मतसे प्रदोषका शब्दार्थ प्रहर है। भादमामकै कष्ण भाद्रमासको शुकाषष्ठीको अक्षयाषष्ठो कहतास और शक्ल दोनों हो पक्षको चतुर्थी का नाम नष्टचन्द्र है। दिन सानादि करनेमे अक्षय फल होता है। इम चन्द्रमाका कभी दर्शन न करना चाहिये। अकस्मात् गहन महीनेको शुकाषष्ठीको गुरुषष्ठी कहते हैं, दर्शन हो जाने पर शान्तिको व्यवस्था करनी पड़ती है। उममें शिवाको शान्ति को जाती है। माघमामको शुक्लपक्षीय चतुर्थों में गोरोपूजा को जातो है चैत्रमासको शलाषष्ठीको स्कन्दषष्ठो कहते हैं. उस उम दिन मूनो खाना भोर क्षोरकर्म करामा निषिद्ध है। दिन कार्तिकको पूजा करनसे इम जन्ममें सुख-सोमाग्य पञ्चमो - जो पञ्चमी चतुर्थी ओर चतुर्थी के चन्द्रमे युक्त और परलोकमें वैकुण्ठ को प्राशि होतो है। हो, वही ग्राह्य है । पर युक्त ग्राा नहीं। पाखिनमामको शुक्लाषष्ठोको बोधनषष्ठी कहते है। 'चतुर्थी संयुका कार्य पंचमी पर या नतु" ( हारीत ) कणाष्टमी अर्थात् जन्माष्टमी, स्वान्दषष्ठो पार शिव. पञ्चमोके समस्त कार्य चतुर्थी मयुक्त होने पर करें, रात्रि पनमें शेषको पकड़ कर काय करें। तिथिके अन्तमें पर युक्त ग्राह्य नहीं है। कणपक्षमें पञ्चमो पूर्व विह पारणा करनी चाहिये। ग्राहय होनसे, शुक्ल पनमें परविध ग्रहणोय है : 'यदि मनमो-षष्ठोयुक्त मलमी युग्भादरके कारण ग्रहणीय पश्चमी पूर्व दिवसके पूर्वाश्रमें चतुर्थीयुक्त हो और बादके है। पञ्चमी, सप्तमी, दशमो, त्रयोदशी, पतिपदा और दिन पूर्वाह्नमें षष्ठोयुक्त हो, त' पूर्वदिन उपवासादि देव- नत्रमो, ये तिथियां उपवासविधिमें सन्मुखो अर्थात् विस. कार्य करने चाहिये । पूर्वाह्नमें चतर्योयुक्त पञ्चमो यदि न व्याव्यापिनो, परयुक्त ग्रहणीय है । सिर्फ हरिवासरमें हो और दूसरे दिन पूर्वाङ्गमें मूहस के भीतर यदि कममे अर्थात् एकादशो में शेषको पकड़ना उचित है। उपवास. कम पञ्चमो पा जाय, तो पूर्वाङ्गक अनुरोधसे दूसो दिन विधिके अनुमार षष्ठोयुक्त सलमौ में हो उपवास करना पृजा करनो चाहिये और उमो दिन पूजाको प्रधानताक चाहिये, अष्टमोयुक्त होने पर नहों। यदि शतापक्षोय कारण उपवास करना चाहिये। मालमोमें रविवार पड़ जाये, तो उसका नाम विजयासप्तमो श्रावणमामको कणापञ्चमीको नागपञ्चमी कहते हैं। है, उस दिन स्नान, दान पोर सूर्य पूजा करनेसे फल उम दिन प्राङ्गणमें मनमाटेवो और अष्टनागको पूजा को होता है। जातो है। इस तरह प्रति पञ्चमो अर्थात् भाद्रमासको ___ भाद्रमासको शला सल्लमीको ललितासममो कहते झाषणपञ्चमो तक पूजा करनी चाहिए। इससे सप भय है। इसमें कुछ टीव्रत किया जाता है। जो इस व्रतको निवारित होता है। करता है, दूसरे जममें उसके लिए एथिवो पर कुछ माघमासको एकपक्षीय चतुर्थीको वरदावसन्त चतुर्थी दुष्प्राप्य नहीं रहता। करते हैं। उस दिन गौरीको पूजा की जाती है, इसके माघमासको एना-समोको माकरी सप्तमो कहते सिवा उत्त पञ्चमीमें लक्ष्मी और सरस्थलोको एकल पूजा । इमको युगाया भी कहते हैं। उस दिन परयो- करके डावास और कलमको पूजा करनी चाहिये। श्री. दयमें यदि गङ्गाखान किया जाय, तो अतसूर्य ग्रहण