पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५५०

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१५६ तिब्बत कर्ता ठहराये गये । फगप और टोगन फगप नाममे रहन्दा जाता रहा, मामास और सम्मान्त लोग भो बागो विशेष प्रमिह हए। १२ वर्ष तक चोन देश में रह कर हो गये। शाक्यनामा लोग इन सब प्रतिनिधियों के हाथों को फगप शाक्यभूमिमें लौट आये। कठपुतलो हो रहे थे। अतः वे इसका कुछ भो प्रतिकार फगप दो गोनको जब शाक्यभूमिमें २ वर्ष हो चुका कर नहीं सकते थे । कलह, युद्ध, षड़यन्त्र, खन खरायो था, तब उन्होंने काग्य की पुस्तक को एक प्रस्थ प्रति प्रादि होने पर भी उन मन प्रतिनिधियों में से किसोने भी लिपि तैयार कराई । यह प्रतिग्निपि म्वर्णाक्षरम निलो गई लामाओंको प्रधानता न छोड़ो। . थी। प्रकत तिब्बतके तेरह जिलोका राजस्व वसूल कर __फग पके परवर्ती चतुर्थ प्रतिनिधि यन्-रिन् क्योषको शाक्यभूमिमें उन्होंने एक चा मन्दिर बनवाया। इन सिवा उन्होंने एक स्वर्गको प्रकागड़ बुद्ध प्रतिमा, एक चोनसम्राटमे एक मनद मिन्नी थो, किन्तु इसके कुछ बहुत जंचा छोरतन (चैत्य ) और अन्यान्य देव प्रतिमा म्मय बादहो वे अपने एक नोकरके हाथमे मारे गये। को स्थापना को, और प्रति दिन एक मो श्रमग्णाकः इनके परवतॊ दोनों प्रतिनिधियांने आईनादिका मस्कार पाहार तथा भिक्षा देनेको पूरी व्यवस्था कर दी। चोन किया था। अनलेन नामक अष्टम प्रतिनिधिने शाक्य सम्राट के साथ नानुमार ये दो बार चोन देशको गये थे। महारामके वेष्टनो प्राचोरादिका निर्माण किया। उन्होंने अबकी बार लोटरी ममय इन्ह ३०० स्व. ३०० हो खन् मर निन और पोन-पाई रि नामक दो मजा- रौप्य और १२००० माटनको पोशाक मिनो थो। गम प्रतिष्ठित किये। इस ममय दिगुण सागको शाक्यम्मामानों में ये हो मबसे अधिक क्षमताशालो थे। क्षमता मबमे प्रवल हो गई थी। यहां उम ममय १८ इनके परवर्ती प्रतिनिधिगण दुवैलमना और अक्षम हजार श्रमग बास करते थे। शाक्यसङ्घाराम और दिगुण प्रतिक समझ जाते थे। उनके ममयमें प्रजाका सख स्वा. सहाराममें इसो प्रधानताको लेकर विवाद उठा । उम विवादको उत्तरोत्तर वृद्धि होतो गई, यहां तक कि अन्त. शाक्यप राज-प्रतिनिधिगण -- में अन लेनने मेना भेज कर दिगुण सङ्घारामको लुटवा (१) शाक्य ससनयो लिया और जलवा डाला। मङ्घाराममें आग लगनेमे कुनगह ससनयो ( इन्होंने राज्य नहीं किया)। कितने श्रमण तो प्राण ले कर भागे और कितने उमोमें जन्न मरे । दम दुर्द शाके कई वर्ष बाद (२) षन् तमन् (१२ ) हो ससेर सेंगे (१म) पुनः यह सङ्घाराम प्रल और नमताथालो हो उठा। उस समय फिर गलुग-4 मतावलम्बियों के साथ विवाद (३) बन कों (१३) कुन रिन् चला। इस बार भो मद्धाराम पूर्व सा तहस नहस कर (४) रयन रिन-क्योप (१४) दोन-षो-पल डाला गया। लेकिन यह सङ्घाराम अभी शाक्यमवाराम- का मुकाबिला कर रहा है। अनजेन जब दिगुण महा- (५) कुन-बन . (१५) षोनत्-सुन रामका ध्वस कर लोटे पा रहे थे, तब रास्ते में भो (६) षन्-द्न् (१६) हो-ससेर-से गे (२य; किमोने इन्हें मार डाला। वनतसुन नामक शेष प्रति- (७) च्यन दोर (१.) गाल-व-ससन पो (१म) निधि फगटु नामक प्रधान मन्त्रों के साथ युद्धमें परास्त (८) अन लोन (१८) द्वन् क्युग-पल हुए। इसके साथ साथ तिब्बतमें जो ७० वर्ष से याज- काधिकार चला आ रहा था, वह भो जाता रहा। (९) ग-पा-पल (१९) सो नम पल तिन्वतमें चीनाधिकार । शाक्य महारामका प्रभुत्व लोप (१०) सेंगेपल (२.) ग्यल-च-ससन-पो (श्य) हो जाने पर दि गुन, फग दुब पोर तमल नामक समा- (११) हो-ससेदपक . (२१)बन-समुन . . राम कामश: प्रभूत चमताशाली हो उठे । १३०२ में