पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६५१

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तुकाराम सभी पापोगे।" इसके बाद विश्वम्भरने औमी मूर्ति स्वपमें तुकारामके दो विवाद हुए थे। उनकी पहली खो- देखो थो ठोक वैसो हो एक विठोवाको मूर्ति पान का नाम सजावाई और दूसरोका पलवाई था। पनबाई काननमें देखो। देके पास हो इन्द्राणी के तौर पर माधारणतः जोजोवाई या जोजाईमामले प्रसिह थी। उन्होंने मन्दिर बनवा कर उसमें उस मूर्ति को स्थापना पहली स्त्रो कासरोगग्रस्त यो, सोसे उनोंने दूसरा की और पाप खय हो उनकी पूजाच नामें नियुक्त हो विवाह किया था इनकी दोनों स्त्रियों में छोटोके अपर हो गये। ये बहुत ही धर्म परायण थे, इमोसे उन्होंने तुका- रहस्योका भार था। तकारामने यद्यपि थोड़ो हो षषस्था राम जैसे वशके गौरव बढ़ानेवाले पुत्रको मान में मसारका गुरुतर भार ग्रहण किया था तो भो रस किया था। गुरुसम्भारको वहन करनेमें पलतकार्य म हुए थे, ___तुकारामका जन्म १६०७ ई० में हुआ था। इनके वरन् वे अत्यन्त दक्षताके माथ गास्थिक कर्तव्योंका पिताका नाम बोलावा और माताका नाम कमका था। सम्यादन करने लगे। बोमाया सदगुणोंसे विभूषित थे पोर कनका अत्यन्त कौलिक-वाणिज्य व्यवसायमें उनकी विशेष प्रतिष्ठा पतिपरायणा थो। इनके प्रथम पुत्र का नाम शान्त जो हुई एवं थोड़े ही दिनों में उन्होंने बहुत से धमाल वणि- था। तुकाराम पिताके हितोय पुत्र थे। कमकाङ्गजब कौके विश्वासभाजन होकर यथेष्ट प्रर्थ उपार्जन किया। गर्भवतो हुई, तब संसारके प्रति उनका अत्यन्त विराग तुकागमके सौभाग लक्षण सब विषयों में हो दिखाई उत्पन्न हुआ था और वे सर्वदा निजन स्थानमें बैठकर देने लगे। मनुथको अवस्था सब दिन एकसो नहीं हरिनाम जपा करतो थो। वे पहलेमे हो जानतो थो रहती। प्रायः सुख के बाद दुःख पा कर अपना स्थान कि उनका पुत्र ( तुकाराम) एक भक्तशिरोमणि होगा। अधिकार कर लिया करता है। तुकारामको भी यह तुकाराम के बाद भो कनकाङ्गक एक पुत्र और एक कन्या सुखको अवस्था पधिक दिन तकनरहो। सत्रह वर्षको उत्पन हुई थी । तुकाराम के पिता इधर जमे पुत्रकन्या अवस्थाम इन्हें पहले पिताका और फिर मातामा सम्पब थे, वैसे हो उनके धनसम्पद को भी कमी न थी। वियोग-दुःख सहना पड़ा। अवस्था उव्रत होनमे ही प्रायः सभी भगवान का नाम तुकाराम माता-पिताके वियोगसे बिलकुल अधोर हो भूल जाया करते है, किन्तु बोलावा और कनका ये उठे। इसो शोकमे मसार बन्धनके समस्त मलको दोनो उस प्रतिक मनष्य नहीं थे। सांसारिक सब अपनीत कर तुकारामके चित्तको निर्मलता सम्पादन प्रकार के मुखौको प्रान करने पर भी वे भगवानको चर्चा किया । भगवति पौर वैराग्य तुकाराममें पुरुषानुकमसे न भूलते थे । यथासमय पुवकन्याका विवाह हुषा, वर्तमान था; किन्तु सम्पद. माता पिताके मेह, विष. किन्तु धन जन-पुत्र प्रभृति होनेपर भी उन्हें महंकारने यानुरक्ति पोर संसारके भाग्ने एकत्र हो कर इतने दिन छुआ तक न था। न्योष्ठ पुत्र शान्तजीके वयः प्राल होने उपाध्यामिक उबति साधनमें अवसर प्रदान नहीं पर उनके अपर समारका भार अर्पण कर उन्होंने निर्विघ्न- किया । दुःख किसे कहते हैं, तुकारामने इसे एक दिन वित्तसे भगवन्को आराधनामें जोवन व्यतीत करनेका भी पनुभव नहीं किया। इतने दिन मंसार उनके निकट प्रकल्प किया पोर तदनुसार चोष्ठ पुत्र शासजोको सुखमय, था, किन्तु माता पिताको मृत्य से उनका जाम Zासीका भार ग्रहण करने के लिये अनुरोध किया; चक्षु अधिलित हो उठा । संसार अनित्य है, दुःख पवश्य- किन्तु शान्तजी बाल्यकालमे हो विरत थे । मुतरां उन्होंने भावी . यह वे अच्छो तरह जान गये। तुका. इस भारको लेना खकार नकिया। तब बोल्लादान रामने तेरह वर्ष से ही समारका भार ग्रहण किया मध्यमपुत्र तुकारामसे कहा। पिताको पात्रा शिरोधाय था; सही किन्तु जबतक माता पिता जीवित रहे, कर तुकारामन तेरह वर्ष की अवस्था में ग्रहस्थीका गुरु तब तक यह भार इतना गुरुसर नहीं माल म . तर भार अपने अपर ले लिया। . होता था। परन्तु पब यह भार उनके लिये