पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७५५

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तरना । . . दो और सब शिया तो या करने के लिए प्रस्तुत हो या पु. ) महोबा होता बरतन। इसमें छोपी, गये, पर यात्रवल्पच प्रस्तुत न हुए। इस पर सम्मा- . कपड़ा शाप लिए रंग रति पार। यनने कहा, तुम हमारी शिषता छोड़ दो। यानवर ने तबार (.वि.)। दुरुस्त, गेकस। २ उपत, 'वैसा ही होगा' यह कह कर जो कुछ उनसे पढ़ा था तत्पर, मुसदार प्रस्तुत, मौको परपुष्ट, मोटा- सब उगल दिया। पन्चान्य सहपाठियाने तीतर बन साजा। ... , कर उस वमनको.चुन लिया। सो कारण उनका नाम यारो ( ०) १दुरस्ती। तत्परता, मुस्तै हो। ततिरोय पड़ा। यजुर्वेद धम्दमें विस्तृत विवरण देखो। शरीरको पुष्टता, मोटाई। समारोह धूमधाम। ५ २ सो शाखाका उपनिषद। यह तीन भागॉम विभस सजावट। है। पहले भागका नाम संहितोपनिषद् । इसमें व्याक रमलो.) तोरे भवः कुलत्य, खान्थयो। रजोर पासवाद मम्बन्धो जाति है। दूमो भागका नयो (Hai) तोर नमति नमाड, खार्थे पर मामपानन्दवनो और सोमरका भृगुवलो है। इन दाना खियां गोराटित्वात कोष । प विशेष, एक प्रकारका सविलित भागोंको वारुणो उपनिषद भी कहत। .शुप । रसके पर्याय-तरण, तेर, कुनोखी पोर रागह। तत्तिरीय उपनिषदमें कवल ब्रह्मविद्या पर हो विचार इसके गुण -यह मिथिर, तिल, अपनापा पोर पर नहीं किया है, बरिक अति समति और इतिहास सबन्धो वर्षद है। भो बहुत सो बात है। इस उपनिषद पर कराय का रमा ( बि) पानोके अपर ठहरना, उतगमा। बहुत अच्छा भाषा है। तैत्तिरोयक (सं.) तत्तिरोय स्वार्थको २ अरोरका चंग संचालन कर पानो में पलमा, परना. शाखाका अनुयायी या पढ़नवाना। तेरस (म' वि.) तिरवामिदं तियंच-पर, तन्वात् तोत्तरोय ब्राह्मण ( स० पु.) कष्णयजुर्वेदीय ब्राह्मण। तिरबादेश । तिर्यग जाति सम्बन्धोय। भित्र भित्र प्रकारके सदुपदेशास पूर्ण थे। है तेराई ( सो) १ रनेको किया। २ सिरोया (स. स्त्रो०) तित्तिरिया प्रोत्सा छन् टाप् । यो । के बदले में मिलनेवाला धन । बंदको एक शाखाका नाम। यजुर्वेद देखो। . तैराक (हि.वि.) तैरनेवाला, जो पहो तरह तैत्तिरोयारण्यक ( पु०) तत्तिरोय शाखाका पारण्यक तरमा जानता हो। पं। इस पंग वानप्रस्खों के लिए उपदेश है। तैत्तिरीयोपनिषद (म स्त्रो०) उपनिषदभेद, एका बेगना (हि.) १ तैरनेका काम बिचो दूसरसे उपनिषदका नाम। बगना । २ घुसाना, माना, गोदना । . .. सतिल (हि.पु.) तैतिल देखो। तेथं (वि.) तौथै दोयते कार्य वा हादिखात् तैनात ('प० वि० ) नियत, नियुक्त, मुकरर। पण । १ वामन्च जो सोध में किया जाय।२ तोध में . सेनातो (हि. t०) नियुक्ति, मुकररा। देने योग्य । ३ तो मम्बन्धो। ४ वह द्रव्यादि जो तीर्थ- त तिडीक (स' स्त्री०, तिसडोकन सस्कृत' कोपधत्वात स्वरूप किसी दूसरे स्थान पाता है। पण । तिन्तिलोक संस्कृत व्यसमादि, वह व्यनन मार्थिक (म त्रि.) तो सिद्धान्तनिषय निवपति जिसमें रमलो दो गई हो। तिलिडोविकार, रमलो. . छेदादि उन । १ तीच सिदान्ताभित, पानवार, कपिल का रस। कणाद पादि। तो वेत्ति ठा वा । सिमान्ताभिा, जो तमिर (म.पु.) तिमिरमेव पण । मनसेग भेद, सिद्धान्त जानता हो । तोर्थे भवः ठम् । तौथं भव, जो पाखको एक विमारो। तिमिर देखा। तोर्थ में उत्पन हो। तमिरिक (स. विमिरो गेगोऽस्तास्य छन् । तिमिर तथ्य (स'• वि.) तोयं सहादित्वात् । तो समो. रोगाल, जिसको निमिर रोगा । पादि, जो तोयं के निकट ।