पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/११

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ताशौच तथा जलमें मजन, जन्मस्थानसे पतन, शृङ्गो, दंष्ट्री और वृद्धि नहीं होती। परन्तु उस अशीचके शेष दिनमें वा नखी द्वारा हत, सर्पदंशन, विषप्रयोग और चण्डाल वा पूर्वोक्त प्रभातमें यदि पिता, माता वा भर्ताको मृत्यु हो चौर द्वारा हत तथा वजाहत और अग्निमें पतित हो कर जाय, तो तभोसे पूर्णाशीच होता है, दो वा तीन दिनकी मरनेसे तीन दिन अशौच होता है। पक्षी, मत्स्य, मृग, गृद्धि नहीं होती। ज्ञाति मरणाशीचके पूर्वाद्ध में पिता, व्याध, दंष्ट्री, शृङ्गी और नखो द्वारा हत होनेसे, उच्च- माता वा भर्ताको मृत्यु होनेसे पूर्वाशौचकाल द्वारा ही स्थानसे गिरनेसे, अनशन और प्रायोपवेशनसे, 'वज्र, शुद्धि होती है। अपगद्ध में मरनेमे पूर्णाशीच होता है। अग्नि, विप, बन्धन और जलप्रवेशसे, क्षतव्यतिरिक्त | ___म्यपुत्र जननाशीचके शेष दिनमें वा पूर्वोन प्रभातमें शास्त्राघातसे यदि किसीकी 'तीन दिनके मध्य मृत्यु हो ज्ञातिके जन्म लेनेसे तथा पिता माना वा भर्नाक मरणा- जाय, तो तीन दिन और यदि छः दिनके बाद हो, तो शौचके शेष दिनमें वा वह प्रभातमें ज्ञातिका मरण होनेसे सम्पूर्णाशौच होता है। यदि किसी प्रकार क्षत द्वारा पहलेको तरह दो वा तीन दिन अशौच नहीं बढ़ता। दिनके मध्य मृत्यु हो, तो तीन दिन अशीच और यदि किन्तु स्वपुत्र-जननाशीचके शेष दिनमें वा तत्प्रभातमें ७ दिनके बाद हो, तो पूर्णाशौच होता है। अकृतप्राय- स्वपुत्रके जन्म लेनेसे पिताके तीन दिन अशौच और बढ़ श्चित महापातकी और अतिपातकीके मरनेसे अशौच जाता है तथा पितृमरणाशीचके शेष दिनमें वा पूर्वोक्त नहीं होता। प्रभातमें मातृमरण होनेसे अथवा मातृमरणाशीचके शेष दत्तकपुत्र सम्बन्धीप अशौचव्यवस्था-सपिण्डज्ञाति यदि दिनगे वा तन्प्रभातमें पितृमरण होनेसे पहलेको तरह दो दत्तकपुत्र हो और उसकी मृत्यु हो जाय, तो दत्तकग्रहण- वा तीन दिन अशौच बढ़ जाता है। कारी पित्रादि सपिण्डोंके पूर्णाशीच तथा सपिण्डके जननाशौचके मध्य यदि अपर जननाशौच हो, और जनन-मरणमें भी उस दसकके पूर्णाशौच होता है। एत- पूर्वजात बालक यदि अशीचकालके ,ध्य ही मर जाय, द्भिन दत्तकके अर्थात् सपिण्ड ज्ञाति भिन्न दत्तकके मरने तो उस मृत बालकके पितामाताके सम्पूर्णशीच और से पित्रादि सपिण्डके तीन दिन और पित्रादि सपिण्डके सपिगिडयोंके सनःशौच होता है तथा उस सद्यःशौच भी मरनेसे उसे उतना ही दिन अशीच होता है। किन्तु द्वारा परजात बालकका अशीच भी निवृत्त होता है। दत्तकके पुत्र आदिके पूर्णाशौच होता है । दत्तककी केवल परजातके मातापिताके पूर्णाशीच रहता है और स्त्रीके अशौच सम्बन्ध मतभेद दिखाई देता है। किसी। इसी प्रकार यदि परजात बालकको मृत्यु हो, तो वैसा मतसे दत्तककी स्त्रीका पूर्णाशौच होगा, फिर कोई कहते नहीं होता। क्योंकि, अशीच पूर्वजात अशौचकाल तक हैं, कि दत्तककी तरह उसका भी तीन दिन अशौच रहता है । अतएव वहां पर सवों को पूर्वजातका अशौच होता है। भोगना पड़ता है। यहां पर विशेषता इतनी ही है, कि यह अशौच-स करकी व्यवस्था---तुल्य मरणाशौचके मध्य परजात बालक र्याद पूर्वजाताशीचके पूर्वाद्ध में जन्म ले यदि अपर तुल्य मरणाशीच हो, तो पूर्वाशो.त्रकालमें ही कर मर जाय, तो उसके मातापिताके उस पूर्वाशौचकाल शातियोंकी शुद्धि होती है। किन्तु यदि पूर्वाशौचके तक अङ्गास्पृश्ययुक्त अशीच रहता है । तुल्यकालव्यापक - शेष दिनमें भपर पूर्ण मरणाशीच हो, तो पूर्वाशौच फिर सामान्य जननाशौच अथवा मरणाशीचके मिलनेसे दो दिन बढ़ जाता है तथा उसे शेष दिनके सबेरे सूर्यो मरणाशीचकाल द्वारा हो शुद्धि होती है। दयसे ले कर दूसरे दिनके सूर्योदय तकके मध्य यदि पुनः _____एक दिनमें यदि दो शातिकी मृत्यु हो, तो सर्वगोत्र- पूर्ण समानाशीच हो जाय, तो पूर्वाशीच तीन दिन और के अशौचकालावधि अङ्गास्पृश्यत्व रहता है। सुतरां बढ़ जाता है। उन वर्द्धित दो या तीन दिनोंके मध्य अपर उस अशीचके शेष दिनमें वा ततप्रभातमें यदि किसी ज्ञानि, पिता, माता अथवा भर्ताको मृत्यु होनेसे उस अन्य ज्ञातिकी मृत्यु घट, नो पूर्वोक्त दो वा तीन दिनकी वर्द्धित पूर्णाशो वकाल द्वारा शुद्धि होतो है, अब उसकी वृद्धि नहीं होती, केवल महागुरुनिपातमें वृद्धि होतो Vol. xv. 2