पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२४

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१६ प्रमजल-प्रमनाथ बद्ध माननगरके शाकवाड़ा प्राममें १७२१ शकको इनका प्रेमटोली -बङ्गालके राजशाही जिलान्तर्गत एक बड़ा प्राम जन्म हुआ था। बचपनसे ही इन्हें कविता लिखनेकी यह अक्षा० २४५५ उ० और देशा० ८८२६ पू०के मध्य बड़ी चाव थी। फलतः आगे चल कर ये अति मधर अवस्थित है। प्राचीनकालमें यह नगर दक्षिणबड़की और सुललित कविता लिखने लगे । थोड़े ही दिनोंमें राजधानीरूपमें गिना जाता है। वैष्णवचूडामणि इन्होंने अलङ्कारशास्त्रमें व्युत्पत्तिलाम कर अपने श्रीचैतन्य महाप्रभु जब गौड़नगर पधारे, तब इसी स्थानमें गुरुको चमत्कृत कर दिया था। १७४८ शकमें इन्होंने कुछ काल तक ठहरे थे । महाप्रभुके आगमनके उपलक्ष- कलकसे आ कर संस्कृत कालेजमें प्रवेश किया । उपयुक्त में प्रति आश्विनमासमें महासमारोहसे एक धर्मोत्सव पण्डितोंकी अध्यापनाके गुणसे प्रेमचन्द्र साहित्य, अल- होता है। ङ्कार और न्यायशास्त्रमें सुपण्डित हो गये। १८३६ ई में प्रेमदास एक मनःशिक्षाके रचयिता । मनःशिक्षामें इनका अध्ययन शेष हुआ । इस समय इन्हें तर्क कहीं कहीं इन्होंने प्रेमानन्द कह कर भी आत्मपरिचय वागीशको उपाधि प्राप्त हुई। दिया है। __ संस्कृत कालेजमें प्रवेश करनेके कुछ दिन बाद ही २ स्वनामख्यात एक पदकर्ता। इन्होंने वंशीशिक्षा कविवर ईश्वरचन्द्रगुप्त के साथ इनकी मित्रता हुई । अव नामसे एक ग्रन्थ लिखा है जो बङ्गसाहित्यके आदरका दोनोंको ही बङ्गभाषाकी उन्नतिमें यथेष्ट चेष्टा थी । इन्हींके धन है । चैतन्य चन्द्रोदयमें ग्रन्थकारने लिखा है, कि यत्नसे 'संवादप्रभाकर और 'संवादभास्कर' नामक जब उनकी अवस्था १६ वर्षकी थी, तब वे वृन्दावन गये। संवादपत्र निकले थे। उस समय वृन्दावनके गोविन्दजीके मन्दिराधिकारी १८६० ई० में प्रेमचाँदने संस्कृत कालेजके तत्कालीन श्रीकृष्णचरण गोस्वामी थे । गोस्वामीने प्रेमदास पर अध्यापक इवि कौवेल माहवके आदेशसे व्याख्या समेत बड़ी कृपा दर्शायी, उन्हें गोविन्दके पाककार्यमें नियुक्त अभिज्ञान शकुन्तलाका २य संस्करण प्रकाशित किया। किया। वहां ये कई वर्ष ठहरे। पीछे उनके बड़े भाई इसके कुछ दिन बाद इन्होंने स्वरचित व्याख्याके माथ वृन्दावन गये और उन्हें घर ले आये। घर आते हो मुरारिमिश्रका अनघ राघव नाटक, उत्तररामचरित और प्रेमदास शान्तिपुर चले गये और वहांसे फिर नवद्वीप दण्डोका काव्यादर्श तथा नैपधारतका पूर्वाद्ध टोका पधारे। नवद्वीपमें रहते समय एक रातको इन्हें स्वप्ना- समेत प्रकाशित किया । काव्यादर्शकी टीकामें वस्थामें महाप्रभुके दर्शन हुए। उसी समय चैतन्यलीला- आपने जो कवित्व और अलङ्कारशास्त्र में पाण्डित्य दिख वर्णन करनेकी उनको प्रवल इच्छा हुई। फलतः चैतन्य- लाया है, वह अति प्रशंसनीय है । अलावा इसके शालि- चन्द्रोदयकी उत्पत्ति हुई। वाहनचरित, नानार्थसंग्रह नामक अभिधान और कुछ यह वणन पढ़नेसे मालूम होता है, कि इसके पहले अलङ्कार प्रन्थ भी लिखना आरम्भ कर दिया था, पर रचना कार्य में इनकी इच्छा नहीं थो और इन्हें अवसर भी उन्हें वे पूरा न कर सके। नहीं मिलता था। वे हमेशा सेवा-कार्यमें लगे रहते थे। ____५७ वर्षकी अवस्थामें आप इस धराधामको छोड़ चार वर्षके मध्य इन्होंने दो ग्रन्थ रचे। स्वर्गधामको सिधार गये। साधुसङ्ग भी आपको सौभाग्य- प्रेमदेवी एक हिन्दू-साम्राज्ञी । मुसलमानी अमलके पहले से प्राप्त हुआ था। कालेजसे बिदाई ले कर आप १८६४ इन्होंने दिल्लीका सिहासन उज्ज्वल किया था। ई०में काशीवासी हुए थे। यहां आपने अपना समय प्रेमधरशर्मा-एक प्रसिद्ध पण्डित । इन्होंने राक्षसकाव्य- ज्ञानानुशीलन, योगसाधन और विद्यादानमें बिताया। को टोका लिखी है। प्रेमजल । स० पु० , १ प्रस्वेद, पसीना । २ प्रेमाश्रु, वह प्रेमनाथ-अयोध्या प्रदेशके खेरो जिलान्तर्गत कलुआ आंसू जो प्रेमके कारण आँखोंसे निकलते हैं। प्रामवासी एक पण्डित। ये जातिके ब्राह्मण थे और प्रमजा ( स० स्त्री० ) मरीनि ऋषिकी पलीका नाम। अली अकबर खाँ महम्मदीकी सभामें १५०० ई०को विध-