पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२५

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प्रेमनारायण-प्रमालिङ्गम मान थे। इन्होंने हिन्दी भाषामें ब्रह्मोत्तरखण्डका अनु- रोना । २ वह आंसु जो प्रेमके कारण आंखोंसे निकले। वाद किया। प्रेमपात्र (मपु० ) वह जिससे प्रेम किया जाय । प्रमनारायण (सं० पु० ) कोचबिहारके एक राजा। प्रेमपास (म० स्त्री०) प्रेमका फंदा या जाल । - कोचबिहार देखो। प्रेमपुत्तलिका ( सं० स्त्री०) १ प्यारी स्त्री । २ पत्नी, प्रेमनिधि-आगरा-निवासी एक साधु। ये रात दिन भार्या । कृष्णसेवामें मत रहते थे। मुसलमानी अमलमें जब आगरा प्रेमपुलक (म० स्त्री० ) वह रोमाञ्च जो प्रेमके कारण शहर मुसमानोंके हाथ आया, तब ये मुसलमानस्पर्शसे होता है। जल नष्ट न हो जाय, इस भयसे प्रतिदिन दोपहर रातको प्रेमप्रत्यय (सं० पु० ) वीणा आदिके शब्दोंमे जिनसे जल लानेके लिये यमुना जाते थे। प्रवाद है, कि एक राग-रागिणी निकलती है, प्रेम करना । दिन रातको काली घनघटासे आकाश छा गया। रास्ता प्रेमबन्ध ( स० पु. ) प्रमः बन्धः ६-तन्। गाढ़ानुराग, दिखाई नहीं पड़ने लगा। अब भक प्रेमनिधि बड़े सङ्कट- गहरा प्रम। में पड़ गये। अन्तर्यामी श्रीभगवान् जलाभावसे भक्त प्रेमवत् ( स० वि०) प्रेम-अस्त्यर्थे मतुप, मस्य व । कष्ट पावेगा, यह समझ मशालची हो कर उन्हें राह प्रेमयुक्त। दिखाते गये थे। प्रेमभक्ति (स० स्त्री०) प्रेम्न भक्तिः। स्नेहयुक्त श्रीकृष्ण- आस पासके स्त्री-पुरुष प्रतिदिन सन्ध्या समय श्रो- मेवा, पुराणानुसार श्रीकृष्णकी वह भक्ति जो बहुत प्रेम- भागवत सुननेके लिये उनके घर जाया करते थे। किसी के साथ की जाय। दुष्ट व्यक्तिने बादशाहसे चुगली खाई, कि प्रेमनिधि पर प्रेमराज गाथाकोषटोका और कर्पूरमञ्जरीटीकाके रच- स्त्रीको अपने घरमें बलात्कार करते हैं। यह सुनते ही यिता। सम्राट्ने उन्हें कैद कर रखा। पीछे स्वप्नमें उनके प्रति प्रेमलक्षणाभक्ति (सं० स्त्री०) प्रेमपूर्वक श्रीकृष्णके चरणों- देवप्रभाव जान कर उन्हें कारामुक्त कर दिया । की भक्ति करना । (भक्तमाल ) प्रेमलेश्या (म० स्त्री० ) जैनियोंके अनुसार एक प्रकारको प्रेमनिधिपन्थ -एक विख्यात तान्त्रिक पण्डित। इनके वृत्ति । इसके अनुसार मनुष्य विद्वान, दयालु, विवेकी पिताका नाम उमापति था। इन्होंने अन्तर्यागरत्न, काम्य होता और निस्वार्थभावसे प्रेम करता है। वीप-दानपद्धति, घृतदानपद्धति, सुदर्शना नामक तन्त्रराज प्रेमवारि (म० पु०) वह आंसू जो प्रेमके कारण निकले, टीका, दीपदानरत्न, प्रयोगरत्नाकर, प्रयोगरत्नकोड़, प्रयोग- प्रेमाश्रु। रत्न-संस्कार, वहिर्यागरत्न, भक्तवतसंतोषक, भक्तिरङ्गिणी, प्रेमा ( म० पु० ) १ स्नेह । २ स्नेही । ३ वासव, इन्द्र। मल्लादश, लवणदानरत्न, शक्तिसङ्गमतन्त्रटीका, शब्दार्थ- ४ वायु। ५ उपजातिगृत्तका ग्यारहवां भेद । चिन्तामणि नामक शारदातिलकटीका और १७५५ ईमें प्रेमामृत ( स० क्ली० ) प्रेम पव अमृतं । प्रेमरूप सुधा। शब्दप्रकाश तथा उसकी टीका लिखी है। प्रमाक्षेप ( स० पु. ) केशवके अनुसार आक्षेप अलङ्कार- प्रेमनिधिशर्मा-मिथिलाके एक प्रसिद्ध स्मार्त पण्डित, का एक भेद। इसमें प्रेमका वर्णन करने में ही उसमें इन्द्रपतिके पुत्र। इन्होंने पृथ्वीप्रमोदय और १३५४ ईमें वाधा पड़ती दिखाई जाती है। ( कविप्रिया) धर्माधर्मप्रवोधिनी नामक स्मार्सनथ प्रणयन किये हैं। प्रेमामृत ( सं० क्ली० ) प्रेम एव अमृतं । प्रेमरूप सुधा। प्रेमनोर (सं० पु.) प्रेमके कारण आंखोंसे निकलनेवाले प्रेमालाप ( सं० पु० ) वह बातचीत जो प्रेमपूर्वक हो। भांसू, प्रेमाश्रु । प्रेमालिङ्गन (सं० पु० ) १ प्रेमपूर्वक गले लगाना। २ प्रेमपातन ( स० क्ली० ) प्रेम्नः स्नेहस्य पातनं यस्मात्, कामशास्त्रके अनुसार नायक और नायिकाका एक विशेष प्रेम्ना पातन वस्येति वा। १ रोदन, प्रेमके आवेगमें प्रकारका आलिङ्गन ।