पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३४१

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वालमा-बालजीवन नैगमेयग्रहको चिकित्सा-बिल्व, अग्निमंथ, छोटी करंज बच्चोंको ग्रहण करतो हैं उससे ज्वर होते हैं। छठे आदिका काथ, सुरा, कांजी और धान्यासका सेक, प्रियंगु, दिन, मास वा वर्षमें शकुनिका नामकी मातृका बोंको सरल काष्ठ, अनंतमूल, सोया गोमूत्र, दधिमण्ड और पीड़ा देती है। उस समय बच्चोंके शरीरमें पीड़ा और अलकांजी आदि द्रव्योंसे पके हुपे तैलका अभ्यङ्ग, दश- | ऊ निरीक्षण आदि लक्षण होते हैं। मूलका काथ, दूध, मधुरगण, खजूर मस्तक आदिसे धीको सप्तम दिन, मास व वर्षमें शुष्करेवती नामको मातृका पका पिलावे । हरीतकी, जटिला और बच, हिंगु, कुष्ठ, | बालकोंको पीड़ित करती है तब उधर गालोजन एवं भल्लातक और अजमोदा आदिसे धूप बनावे । रातिमें | मुष्टिवद्धता आदि.लक्षण प्रकट होते हैं। जब लोग सो जावे तब उल्ल, और गृध्रका पुरीष निर्मित अष्टम दिन, मास वा वर्षमें अर्थ कामातृका और धूप, तिल, तण्डुल और देवीकी पूजा करे वा बर वृक्ष नवम मास, दिन वा वर्ष में स्वस्तिकामातृका, दश दिन, मूलमें बालकको स्नान करा यह मंत्र पढ़े। मास वा वर्षमें नि तामातृका, ग्यारहवें दिन, मास "अजाननश्चलाक्षि : कामरूपी महायशाः। वा वर्ष में कामुकामातृका आक्रमण करती है। इन बाल' पालयिता देवो नैगमेयोऽभिरक्षतु ॥" सब मातृकाओंके आक्रमण करनेसे इनकी पूजा या बलि (सुश्रत उत्तरत० २७-३७ भावप्र० बालरोगाधि) देवे जिससे ये संतुष्ट हो बालकका परित्याग करे। ऐसा रावणकृत बालतंत्रमें बालग्रहका विशेष विवरण लिखा करनेसे बच्चा अपने आप हो अच्छा हो जावेगा। हुआ है। विस्तार हो जानेके भयसे इसको नहीं लिखा रावणकृत बालतंत्र देखो गया। अति संक्षेपसे इसका वर्णन यहां किया गया है । बालप्राम-शोणपाके पश्चिम दिगवत्ती एक प्राचीन प्राम। ये ग्रह बालकोंको जन्मसे १२ वर्ष तक पीड़ित करते हैं। वालगौरीतीर्थ ( स० क्ली० ) एक तीर्थका नाम । ऊपरको अवस्थावालेको ग्रहोंकी शङ्का नहीं रहती। | बालचन्द्र ( स० पु०) बालेन्दु । प्रथम दिन, प्रथम मास, वा प्रथम सालमें जब नंदा बालचतुर्भद्रिका ( स० स्त्री०) औषधविशेष । प्रस्तुत नामक मातृका बालकों पर आक्रमण करती है तब ज्वर प्रणाली-मोथा, पीपल, अतीस, कर्कटङ्गी आदिके और आखें बंद हो जाती हैं, शरीर सदा दुःखित रहता | चूर्णको मधुके साथ सेवन करानेसे छोटे छोटे बच्चोंका है जिससे बालक शयन नहीं कर सकता। सदा रोता ही ज्वरातिसार, श्वास, काश और वमि दूर हो जाती है। रहता है दूध अच्छा नहीं लगता और घुनट शब्द करता | बालचरित (स० क्ली०) बालकोंका खेल। रहता है। बालचय ( स० पु०) बालस्य बालकस्येव चर्या यस्य । १ द्वितीय दिन, मास वा वर्ष में सुनंदा नामक मातृका. कार्तिकेय । २ बालकों का चरित्र । के वालक पर आक्रमण करनेसे ऊपरको तरह लक्षण | बालचर्या ( स० पु०) बालकका कार्य । प्रकाश होते हैं। बालचारीघृत-औषधविशेष । प्रस्तुत प्रणाली-घृत तृतीय दिन, मास वा वर्षमें पूतना नामकी मातृका- ४ सेर, आमरुलका रस ४ सेर, बकरीका दूध ४ सेर ; के आक्रमण करनेसे ज्वर, चक्षउन्मीलन, गालो जन, | चूर्णके लिये कैथ, त्रिकटु, सैन्धव, वराकान्ता, उत्पल, मुष्टिवद्ध, क्रंदन, ऊद्ध निरीक्षण आदि लक्षण होते हैं। सुगन्धवाला, बेलसोंठ, धवफूल और मोचरस कुल मिला चतुर्थ दिन, मास वा वर्ष में मुखमण्डिका नामकी मातृका कर १ सेर। इस घृतका अच्छी तरह पाक कर सेवन बालक पर आक्रमण करती है। जिससे प्रथम ज्वर, फिर करनेसे अतिसार और ग्रहणीरोग जाता रहता है। चक्षुउन्मोलन, प्रोबानमन और रोदन आदि लक्षण बालचिकित्सा (सं० स्त्री०) बालस्य चिकित्सा ।१वालक- होते हैं। बच्चे को नींद नहीं आती और दूध नहीं की चिकित्सा। २ कौमारभृत्या, दायागरी। पीता। बालछड़ (हिं स्त्री०) जटामासी। पंचम दिन, मास वा वर्ष में कटपूतना नामकी मातृका बालजीवन (सं० क्ली० ) वालस्य जीवनं । दुग्ध । बालक-