पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३८ प्लात-फंसनी नहीं, यूगल पर्वत तथा बोर्नियो द्वीपमें भी पाई जाती प्सा ( स० स्त्री०) प्सा-भावे-अड। भक्षण, खाना । पोत ( सं० की०) प्र.वै-क्त, सम्प्रसारणं रस्य ल। सात ( सं०नि०)प्सा कर्मणि-क्त। भक्षित, जो खाया सुश्रतोक्त शस्त्रकोपकरणभेद। शत्रम देखो। २ गया हो। पित्तविकारविशेष, पित्तका विकार जो महसे गिरता है। प्सान म क्ली० ) प्सा भावेल्युट। भोजन । ३ कपट, गूदड़, लत्ता। ४ पदी । | पसु (सं०पू०) प्सा-वाहुलकात् कु। रूप, चेहरा। पोप ( सं० पु० ) प्लूप-भावे-घना १दाह । भावे ल्युट। प्सुर (सं० त्रि० ) प्सु-बाहु. अस्त्यर्थे र। रूपयुक्त, (क्ली०) २ पोषण, दाह । रूपवान् । फ-हिन्दी वर्णमालामें वार्डमयां ध्यान और पवर्गका । जम्हाई। ७ वद्धक। ८ स्फान । ६ स्फुट । १० फल- दुसरा वर्ण । इसके उच्चारणका स्थान ओष्ट है और इसके लाभ। ११ मुग्धबोधोक्त संज्ञाविशेष । उच्चारणमें आभ्यन्तर प्रयत्न होता है। इसे उच्चारण करनेसे फंक ( हिं० स्त्री० ) फाक देखो। जीभका अगला भाग होठोंसे लगता है। इसलिये इसे फंका ( हिं० पु०) सूखे दाने या बुकनीकी मात्रा जितनी स्पर्शवर्ण कहते हैं। इसके वाहाप्रयत्न, विवार, श्वास और एक बार मुहमें फांकी जा सके। २ खण्ड, टुकड़ा। अघोष हैं। इसकी गिनती महाप्राणमें होती है। फंकी (सं० स्त्री०) १ सूखी फांकनेकी चूर्ण आदिकी पुड़िया, फांकनेकी दवा । उतनो दवा जितनी एक ___फ कार रक्तविद्य ल्लतामदृश, चतुर्वर्गप्रद, पञ्चदेव- बारमें फांको जाय। स्वरूप, पञ्चप्राणमय, त्रिगुण और आत्मादि तत्त्वसंयुक्त फंग ( हिं० पु.) १ बन्धन, फंदा। २ अनुराग, राग। तथा त्रिगुण महित है। इसकी कुण्डली ब्रह्मा, विष्णु और फंड ( अपु०) वह धन वा मपत्ति जो किसी नियत रुद्ररूपिणी है। इसके वाचक शब्द ये सब हैं सखी, | काम में लगानेके लिये एकत्र की जाय। दर्गिणी धुम्रा, वामपार्श्व, जनार्दन, जया, पाद, शिखा, पंद ( हि० पु० ) १ घंध, बंधन । २ दुःख, कष्ट । ३ नथ. गैद्री, फेत्कार, शाखिनीप्रिय, उमा, विहङ्गम, काल, की कांटी फंसानेका फंदा, गूज। ४ रहस्य, मर्ग। ५ कुब्जिनी, प्रियपावक, प्रलयाग्नि, नोलपाद, अक्षर, पशु छल, धोखा । ६ जाल, फांस।। पति, शशी, फुत्कार, यामिनो, व्यक्ता, पावन, मोहवर्द्धन, पंदना ( हिं० क्रि० ) १ फंदमें पड़ना, फंसना। २ उल्ल- निष्फलवाक, अहङ्कार, प्रयाग, ग्रामणी और फल। वन करना, लांघना । (नाना तन्त्रशास्त्र) फंदरा ( हिं० पु०) फदा देखो। “प्रलयाम्खुदवर्णाभां लजिह्वा चतुर्भुजाम्। पंदवार ( हि० वि० ) फंदा लगानेवाला । भक्ताभयप्रदां नित्यां नानालङ्कारभूपिताम् ॥ पदा ( हि पु१) १ रस्सी तागे आदिका घेरा जो किसी- एवं ध्यात्वा फकारन्तु तन्मन्त्र दशधा जपेत् ॥" ! को फंसानेके लिये बनाया गया हो, फांद। . पाश, वर्णोद्धारतन्त्र) । जाल। ३ कष्ट, दुःख । इस प्रकार ध्यान करके फ कारका दश बार जप फंदाना | हिं० क्रि०) १ जालमें फंसाना, फंदेमें लाना ।२ करना होता है। मातृकान्यासमें इस वर्ण द्वारा वाम- कुदाना, उछालना। पार्श्वमें न्यास किया जाता है। काव्यके आदिमें इस फंफाना ( हि० कि० ) १ शब्द उच्चारणके समय जिह्वाका कांपना, हकलाना। २ आग पर स्खौलते दूधका फेन पर्णका प्रयोग नहीं करना चाहिये, करनेसे दुःखलाभ छोड़ कर ऊपर उठना। होता है। फंसना ( हिं० कि० ) १ बंधनमें पड़ना, पकड़ा जाना । २ का सं० की०) फक असदावहारे त । १रूक्षोक्ति, रूग्वा अरकना. उछलना। वचन । २ फुत्कृति, फुक्कार। ३ निष्फल भाषण । फैसनी ( हिं० स्त्री० , एक प्रकारकी हथौड़ी जिससे कसेरे ४ यक्षसाधन । ५ झंझावात. अंधड़ । ६ जम्मानिस्फार, लोटे, गगरे आदिका गला बनाते है। ।