पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४५

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फंसाना-फकीर फंसाना (हिं० कि० ) १ वशीभूत करना, अपने जाल या मानते हैं। आज भी कुलवर्गामें उन महात्माका पवित्र- वशमें लाना। २ फंदेमें लाना, बझाना। ३ अटकाना। क्षेत्र विद्यमान है। वे सभी सिया-सम्प्रदायभुक्त हैं । फैसिहारा ( हिं० वि० ) फंदवार, फंसानेवाला। सुनारियागण अबदुल सुतर इ-नाकके शिष्य और तन्म फक (हिं० वि० ) स्वच्छ, सफेद। २ वदरंग। (स्त्री०) तावलम्बी हैं। तवकातिया वा मदारियागण अपनेको ३ दो मिली हुई चीजोंका अलग अलग होना, मोक्ष। , शाह-मदारके शिष्य बतलाते हैं । मलङ्गागण शाह-मदारके फकड़ी ( हिं० स्त्री०) दुर्गति, दुर्दशा। पादानुध्यात जामन तिके और रफाई वा गुज मारगण फकत ( अ० वि० ) १ पर्याप्त, अलम्, बस। २ केवल, सैयद अहमद फकीर रफाईके शिष्य हैं। इनका ईश्वर सिर्फ। पर ऐमा विश्वास है. कि वे अपना हाथ काट कर पुनः फकीर ( अ० पु०) १ भीख मांगनेवाला, भिग्वमंगा। २ उसे जोड़ सकते हैं। इसी विश्वासके वल ये स्वच्छासे साधु, संसारत्यागी । ३ निधन मनुष्य, वह मनुष्य जिसके . अपना अंग प्रत्यग काट डालते हैं। जलालियांगण पास कुछ न हो। सैयद जलालउद्दीन बोखारोके शिष्य हैं। सोहागियागण फकीर --मुसलमान भिक्षक-सम्प्रदाय । भिक्ष कत्तिने मृमा सोहागके अनुचर बतलाते हैं। ये लोग सब समय ही ये जोवनधारण करते हैं। फकोरोंके मध्य भिन्न भिन्न स्त्रियोंकी तरह वेशभूषा पहनते. तथा गीतवाद्य और श्रेणियां हैं। भारतवपमें इस प्रकारकी केवल दश श्रेणी : नृत्यादि करते हैं। नक्मवान्दयागण नक्सवन्दीवासी देखी जाती हैं । जलालउद्दीन मुलावी सम्प्रदायके वहा उद्दीन के शिष्य हैं। ये लोग रातको अपने हाथमें प्रतिष्ठाता थे। यूरोपीय तुरकके मध्य फकीरकी प्रायः . चिराग ले कर भीख मांगने निकलते हैं। येओवा पियारी- ६० विभिन्न श्रेणियां हैं। इनमेंसे कनस्तान्तिनोपलके गण साधारणतः श्वेत वस्त्र पहना करते हैं। जिस प्रकार बतासीगण निरीश्वरवादी हैं। वे महम्मद को नहीं मानने हिन्दू लोग साधु संन्यासिका सम्मान करते हैं उसी प्रकार और न उनके बनाये कुरान शास्त्र पर ही विश्वास रखते मुसलमान लोग फकीरका । फहावत है - फकीरको हैं। सभी सुफी और अलीप्रवर्तित सिया सम्प्रदायभुक्त तीन चीजें चाहिये, फाकह, कनात और रियाज ; अर्थात् हैं। वहांके रफाई दग्वेशगण शारीरिक कपको ही फारसीम फकोर हरफोम लिखा जाता है, फे से फाकह मोक्षलाभका प्रधान उपाय समझते हैं। भारतवर्ष में एक (व्रत ), काफसे कनात ( मन्नाप ) और रे-से रियाज श्रेणीके फकोर हैं जो हमेशा मुसलमान-तीर्थों में घुमा । ( मेहनत ) । करते हैं। प्रायः सभी फकीर बहुत दूर पश्चिम हारि- फकीर एक धर्मसन्प्रदाय। कुछ दिन हुए, बङ्गलाके राज्यमें जा कर तुकसन्यासो गुलवावाके पवित्र क्षेत्रका गोआड़ी कृष्णनगरके अञ्चटमें फकीर नामक एक उपासक- दर्शन करते हैं। पूर्व-दक्षिण सिंहल आदि स्थानोंमें भी सम्प्रदाय प्रवर्तित हुआ है। इस सम्प्रदायमें हिन्द और दौड़ लगाते हैं। साधारणतः भारतवासी फकीर धर्मः मुसलमान दोनों ही जातिके लोग हैं। अधिकांश मुसलमान प्रभावहीन और नीच समझे जाते हैं। वे सभी प्रायः हैं, हिन्दूको सन्न्या थोड़ी है । हिन्दूफकीर मभी गृहस्थ 'बे-सेरा' हो गये हैं अर्थात् कोई भी महम्मदके उपदेशानु- हैं, मुसलमानोंमें भी उदासीनको संख्या बहुत थोड़ी है। सार कार्य नहीं करता। जो अब भी 'बासेरा' हैं अर्थात । ये लोग पीर पैगम्बर आदि कुछ भी नहीं मानते। धर्मका पालन करते आ रहे हैं उन्हें 'सालिक' कहते हैं। सेरि साहबने भी एक श्रेणीके हिन्दू फकीरको कथाका फकोर साधारणतः कब्रिस्तान, आस्तानामें रहना उल्लेख किया है। ये लोग साधारण गोसांई-सम्प्रदाय- पसन्द करते हैं, या यों कहिये, कि फकीरको जहां रात ! के हैं। इनमेंसे बहुतेरे मूर्ख हैं और देवताविशेषके उपा- हो गई वहीं सराय है। काद्रिया वा बनावागण अपनेको सक हैं। जो विद्वान हैं वे ब्रह्मचर्यका अबलम्बन करके वोग्दादवासी सैयद अबदुल कादेर-जिलानीके शिष्य बत- मन्दिर में पूजापाठमें अपना समय बिताते हैं । परन्तु सभी लाते हैं। चिस्तिगण बन्दनाराजको अपना धर्मगुरु * Mr. Sherringa Hindu Tribe and Custs.